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Banks और RBI आमने-सामने: बड़े घरानों के banking जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहते Banks?

आखिर बैंक को अपनी निरीक्षण रिपोर्ट और जोखिम आकलन से जुड़ी सूचना साझा करने में समस्या क्या है, अगर कोई न लोन चुका रहा है न ब्याज भर रहा है तो उसकी जानकारी साझा करने में बुराई क्या है ?

By Girish Malviya

कोई आम आदमी यदि होम लोन( Home Loan) नही चुका पाए तो उसकी सूचना अखबारों में बड़े बड़े सार्वजनिक विज्ञापन देकर छपवाई जाती है और संपत्ति को नीलाम कर दिया जाता है. लेकिन जब बात अडानी अम्बानी जैसे धन कुबेरों की आती है तो कर्ज देने वाले बैंक ही उनकी ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं कि हम उनके लोन डिफॉल्ट के बारे में कोई सूचना सार्वजनिक नही करेंगे


कल रिजर्व बैंक (Reserve Bank)के बड़े डिफॉल्टर( Defolters) की जानकारी आरटीआई( RTI) के माध्यम से देने के निर्देश के विरोध में HDFC बैंक, SBI, KOTAK MAHINDRA बैंक और IDFC First बैंक समेत कई निजी बैंक( Private Bank) ने सुप्रीम कोर्ट( Supreme Court) का रुख किया है। दरअसल बड़े प्रयासों के बाद रिजर्व बैंक ने इन बैंकों को आरटीआई कानून के अंतर्गत बड़े डिफॉल्टर की जानकारी साझा करने का निर्देश दिया था. जिसका यह बैंक विरोध कर रहे है.


ऐसी यह पहली याचिका नही है PNB और UBI ने इस मामले में कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इनकी याचिका खारिज कर दी थी।


फिर भी यह बैंक नही माने ओर अब एक नयी याचिका लेकर कोर्ट के सामने पुहंच गए, आखिर बैंक को अपनी निरीक्षण रिपोर्ट और जोखिम आकलन से जुड़ी सूचना साझा करने में समस्या क्या है, अगर कोई न लोन चुका रहा है न ब्याज भर रहा है तो उसकी जानकारी साझा करने में बुराई क्या है ?


6 साल से यह मामला लटका कर बैठे हुए हैं. 2015 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाम जयंतिलाल एन. मिस्त्री मामले मेंसर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई से कहा था कि वे आरटीआई एक्ट के तहत डिफॉल्टर्स लिस्ट, निरीक्षण रिपोर्ट इत्यादि जारी करें. अभी तक जो भी सूची जारी की गई है वो सब पुराने डिफॉल्ट मामलों की है
आपको याद होगा कि 2020 मार्च के मध्य में राहुल गांधी ने सदन में विलफुल डिफॉल्टर का मुद्दा उठाया था उन्होंने प्रधानमंत्री से 50 विलफुल डिफॉल्टर के नाम पूछे। जिसके जवाब देते हुए वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि इसमें छुपाने की कोई बात नहीं है। लेकिन उस वक्त भी जो सूची पेश की गई वह पुरानी सूची थी.


2015 में जो एनपीए ढाई लाख करोड़ था वो  आज 12 लाख करोड़ से ज्यादा कैसे हो गया. कौन कौन उद्योगपति है जिसके लोन NPA हो रहे हैं ? क्या देश के आम नागरिक को इतनी महत्वपूर्ण बात भी जानने का अधिकार नही है ?


हमारा आपका मेहनत से कमाया पैसा जो इन बैंकों में जमा है उसी के आधार पर इन बड़े उद्योगपतियों को लोन देता है,  ये बड़े बड़े बैंक क्या लोन अपनी जेब से देते हैं ? जो हमे यह नही बताएंगे ? कि किसका कितना कर्ज बाकी है और किसने कर्ज डुबो दिया है ?

(ये लेखक के निजी विचार है)

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