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भारत की बैंकिंग व्यवस्था चरमराने को है…

2015 में जो एनपीए ढाई लाख करोड़ था। वो 10 लाख करोड़ से ज्यादा कैसे हो गया? क्या इसके लिए सिर्फ यूपीए सरकार ज़िम्मेदार है या मौजूदा सरकार की भी कोई जवाबदेही है...

By: Girish Malviya

RBI कह रहा है कि ग्रॉस एनपीए में काफी इजाफा होगा। RBI ने अपनी नई वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (FSR) गुरुवार को जारी की। इसमें कहा गया है कि बेसलाइन परिदृश्य में भी बैंकों का ग्रॉस NPA मार्च 2022 तक बढ़कर कुल 9.8% हो सकता है। जबकि बहुत ज्यादा दबाव की स्थिति में ये बढ़कर 11.22% तक हो सकता है।

2015 में जो एनपीए ढाई लाख करोड़ था। वो 10 लाख करोड़ से ज्यादा कैसे हो गया? क्या इसके लिए सिर्फ यूपीए सरकार ज़िम्मेदार है या मौजूदा सरकार की भी कोई जवाबदेही है…

कब तक ठीकरा आप UPA पर फोड़ते रहेंगे?

इस समय बैकों के पास जमा कम हो रहा है, जबकि वह बड़े उद्योगपति को कर्ज तेजी से बांट रहे हैं। यह एक जोखिम की स्थिति है। जोखिम की स्थिति इसलिए क्योंकि अगर किसी वजह से उसके कर्ज बड़े पैमाने पर फंस जाते हैं तो उसके पास अपने जमाकर्ताओं को देने के लिए पैसे नहीं होंगे…… यह बहुत खतरनाक स्थिति बन सकती है।

एक बड़ी समस्या और है बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ लगातार गिर रही है यानी आम जनता में कर्ज मांगने वालों की रफ्तार दिनो दिन कम हो रही है। अब आम आदमी अर्थव्यवस्था की बदतर होती स्थिति को देखते हुए कर्ज लेने से बच रहा है। यह बैंकों के लिए बहुत चिंता की बात है। क्योंकि बैंक के लाभ का मुख्य स्रोत कर्ज के उठान और उनकी समय पर वापसी ही है। ऐसे में कर्ज लेने की गिरती दर उनके लाभ को सीमित करेगी। यानी बैंक इस समय दोहरी मुसीबत से घिरे हैं। पहली जमा दर लगातार कम हो रही है, जिससे बैंकों का पूंजी आधार सिकुड़ रहा है। दूसरे, पहले के फंसे हुए कर्ज वापस नहीं आने से उनके बही-खाते गड़बड़ाये हुए हैं।

इन दिक्कतों से भारत का बैंकिंग ढांचा कभी भी चरमरा सकता है। केंद्र सरकार ने पहले ही फैसला कर लिया था कि प्रमुख सरकारी बैंकों को अब बेलआउट पैकेज नहीं दिया जाएगा……..  बहुत ही जल्द अब बेल इन का भूत वापस आ जाएगा, यानी जमाकर्ताओं की रकम से बैंको के घाटे की पूर्ति…

(ये लेखक के निजी विचार है।)

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