

यह निर्विवाद रूप से स्वीकार्य होना चाहिए कि कोरोना महामारी से सीधी भिडंत समाज के तीन जनों को है. डाक्टर(अन्य स्वास्थयकर्मी के साथ) पुलिस और पत्रकार. डाक्टर हमारी पहली जरूरत हैं. यह अपने अन्य सहकर्मियों की मदद से मरीजों को संभालने और उन्हें बेहतर करने के लिए दिन-रात मिहनत कर रहे हैं. इनके काम करने की कोई तय समय सीमा नहीं है. हर कोई इनके काम की सराहना करते हुए इनके सामने नतमस्तक है. इन्हीं खूबियों के कारण ही इन्हें भगवान का दर्जा प्राप्त है. बावजूद इसके डाक्टर हर रोज मरीजों के परिजनों के साथ-साथ शासन और सरकार के निशाने पर हैं. हाथापाई, मार पिटायी से लेकर पिछले करीब डेढ वर्षों से बिना छुट्टी लिए अपनी और परिवार की पीड़ा झेल रहे हैं.

दूसरी सबसे बड़ी भूमिका पुलिस विभाग की है. अधिकांश भारतीय आदतन नियमतोड़ और आत्मानुशासन से हीन होते हुए सीना तानकर चलने में विश्वास करते हैं. जाहिर है, इन्हें लाइन पर लाकर राइट टाइम करने के लिए पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है. यहां ध्यान रहे, मैं सिविल मजिस्ट्रेट की बात नहीं कर रहा हूं जो अक्सर चैम्बर नहीं रहने की स्थिति में किसी छायेदार पेड़ के नीचे अपनी कुर्सी लगाकर केवल रोब झाड़ने का इकलौता काम करते हैं. मुख्य जवाबदेही वर्दीधारी पुलिसकर्मियों(अधिकारी सहित) को मैंदान में सामने से असंख्य मुर्खों से जूझना पड़ता है. आप सोच सकते हैं कि यदि हम अनुशासित होते तो सख्त लॉक डाउन की जरूरत ही क्यों आन पड़ती, यह एक बड़ा सवाल है.

तीसरा प्लेयर जो सीधे तौर पर कोरोना महामारी से आमने-सामने की लड़ाई लड़ रहा है- वो है पत्रकार विरादरी के लोग. कुछ मायनों में ऊपर वर्णित दोनों से अधिक घातक कदम उठाते हुए अपनी डयूटी को अंजाम देने में जुटे हुए हैं. फर्ज कीजिए, श्मसान घाट हो या कब्रिस्तान की जमीनी सचित्र कवरेज के लिए तो पत्रकार ही जाएंगे जहां इस महामारी की संक्रमण की आशंका सबसे ज्यादा है. पिछले दिनों संपन्न विधानसभा चुनाव में आयोजित रैलियों में उमड़ी भीड़, जिसमें संक्रमित भी शामिल होंगे, को पत्रकार अपनी जान हथेली पर रखकर कवर किया. परिणाम क्या हुआ, अधिकांश पत्रकार संक्रमित हुए. आज भी कई ईलाजरत हैं तो कई अपना जीवन गंवा बैठे. इस सन्दर्भ में दो नाम जो तुरंत जेहन में आता है, वो हैं- रोहित सरदाना और अरूण पाण्डेय. इन दोनों नामचीन पत्रकारों को कोरोना रूपी जान लेवा प्रसाद बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ही मिला. दोनों ने जमीनी हकीकत को परखने के लिए दिलचस्प बन चुकी इस चुनावी दंगल में सशरीर उपस्थित होना जरूरी समझा. नतीजा सामने है. दोनों को अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी.
मेरा मकसद इस कोरोना महामारी के संघर्ष में दो अन्य पहलवानों(चिकित्सक और पुलिस) को कमतर आंकना कतई नहीं है. मगर कुछ अन्तर जरूर है जिसकी चर्चा करना ही मेरा मकसद है. डाक्टर चिकित्सा विधा के मास्टर होने के नाते तमाम वैसे ऐहतियात बरतने को प्राथमिकता देते हुए खुद को कम से कम संक्रमित होने की कोशिश करते हैं. वो बेहतर जानते हैं कि कैसे खुद को बचाया जा सकता है. अधिकांश मामलों में उन्हें इनडोर वातावरण में काम करना होता है. बेशक वो 24X7 काम करते हैं लेकिन उन्हें खुद की जान बचाने के लिए मेडिकल ज्ञान के आधार पर तय लक्ष्मण रेखा की जानकारी होती है जिसे वो हरगिज नहीं पार करते हैं(करना भी नहीं चाहिए). यदि डाक्टर संक्रमित होते भी हैं तो वो अपना इलाज शुरुआत से ही बेहतर तरीके से कर सकने में सक्षम होते हैं.
इस खेल का दूसरा खिलाड़ी पुलिसकर्मी हैं. यह मान्य सत्य है कि यह वर्ग शारीरिक रूप से ज्यदा मजबूत, सख्त और विपरीत परिस्थितियों को झेलने में सक्षम होते हैं. उन्हें इस तरह की ट्रेनिंग भी दी जाती है. पुलिस बंधु अक्सर ऐसे हालातों से पूर्व परिचित और झेल चुके होते हैं. ऐसे में, कोरोना उन्हें ज्यादा नहीं बिगाड़ पाता है.
इस खतरनाक खेल में शामिल तीसरा प्लेयर जिसे प्रजातंत्र में चौथा खंभा कहा जाता है, मन से ही अपने आप को ‘गामा’ मान बैठा है. पत्रकार विरादरी के लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि अधिकांश पत्रकार(खासकर युवा) अपनी झूठी ठसक में जीता है. कुछ ठसक और गुमान तो पत्रकारिता की जरूरत भी है, मगर जब हम संयम खोते हैं तो जान पर बन आती है. कोरोना काल में तो यह साफ उभर कर सामने आ चुका है. हर विषम परिस्थितियों में पहुंचना पत्रकारीय धर्म है और इस धर्म का निर्वाह करते हुए हमारे बंधुओं की कोशिश होती है कि वो सच शासन-सरकार और जनता के सामने लाए. सच्चाई तो यह है कि सालों तक वातानुकूलित(सामान्य से बहुत अधिक ठंड) स्टूडियों में रहने के बावजूद वह बंदा फील्ड में जाने का निर्णय लेता है. यह चुनौती उन महिला एंकरों के लिए और भी मुश्किल खड़ी करती है जो परिधान से लेकर श्रृंगार तक के लिए जानी जाती हैं, और जब उन्हें भी फील्ड रिपोर्टिंग करनी पड़ती है. मेडिकल साइंस भी मानता है कि हमारी शारीरिक क्षमता इस बात पर अधिक निर्भर करती है कि हम किस वातावरण में पले-बढ़े हैं और हमारी दैनिक कार्यशैली सह कार्यस्थल का वातावरण कैसा है.
नतीजा सामने है. हर दिन हम किसी अजीज पत्रकार मित्र को खो रहे हैं. पत्रकारों का स्वभाव से निर्भीक, साहसी और चुनौती को स्वीकार करना मंहगा साबित हो रहा है. जोश में होश खोकर खतरे से खेलना हमारी आदत में शामिल है, मगर अब बहुत हो गया. मैं अपने तमाम पत्रकार बंधुओं से आग्रह करता हूं कि अपनी पेशागत भावनाओं पर काबू रखते हुए खुद का ख्याल रखें. ख्याल रहे कि आप अपने परिवार की पहली जरूरत हैं. बाकी, मैं विश्वास दिलाता हूं कि मित्र, शासन-सरकार और आपका प्रबंधन दो मिनट का मौन और अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि लिखकर अपना अंतिम फर्ज पूरा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा
डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी एमिटी शिक्षण संस्थान से जुड़े हैं, उक्त लेख लेखक के निजी विचार है।


