

Opinion

दिनांक 12 जनवरी 2021 के दिन स्थानीय दैनिक समाचार पत्र में एक हृदय झकझोरने वाली खबर आई । खबर यह थी कि देवघर ग्रिनबीच स्कूल के डायरेक्टर की बीमारी के चलते असामयिक निधन हो गया । कारण आर्थिक तंगी के कारण ईलाज की समुचित व्यवस्था का न होना बताया गया था। आर्थिक तंगी के पीछे की वजह विगत दस महीनों से स्कूल का कोरोना महामारी के चलते बंद होना था।
कुछ दिन पूर्व इसी तरह की खबर भागलपुर से आई थी:-
कुछ दिन पूर्व इसी तरह की दुख:द मृत्यु की एक खबर भागलपुर से आई थी । रसायन विज्ञान का कोचिंग संस्थान चलाते थे। जाहिर है कि सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं में मुकम्मल नौकरी न मिलने के कारण आजीविका के लिए अपना निजी कोचिंग शुरू किया होगा। खबर थी कि कोचिंग सेंटर स्थापित करने के लिए उन्होंने बैंक से कर्ज भी लिया था । सब ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन कोरोना ने सब कुछ बिगाड़ दिया । लाकडाउन की वजह से कोचिंग बन्द हो गया। बैंक इएमआई का भुगतान रूक गया। बैंक ने तकादा भेजना शुरू कर दिया । एक तरफ घर गृहस्थी का बोझ और दूसरी तरफ बैंक का दबाव। तंग आकर खुदकुशी कर ली। हालांकि, खुदकुशी ऐसे पढे-लिखे लोगों के लिए अशोभनीय है। शिक्षा तो हमें विपरीत परिस्थिति से धैर्यपूर्वक जूझना सिखाती है। लेकिन, यह भी सोचनीय है कि कोई भी खुदकुशी अतिअसमान्य परिस्थिति में ही करते हैं।
छोटे शिक्षण संस्थानों पर बैंक का कर्ज और ई एम आइ भुगतान की समस्या:-
विगत दो दशकों मे देवघर में भी अनेकों कोचिंग सेंटर खुले हैं । आर्ट्स एंड कामर्स के कोचिंग सेंटर के संचालक या शिक्षक प्राय: छात्र ही हैं। इनमें अधिकांश के लिए आजीविका का एकमात्र साधन यही है। कोरोना काल के दौरान इनकी माली हालत खराब हो गई है। प्रायः सभी तनाव की वजह से परेशान हैं। कुछ तो ब्लडप्रेशर और ब्लड सुगर के शिकार हो गए हैं । नये एवं छोटे निजी स्कूल के प्रिंसिपल /निदेशक की परेशानी कम नही है। निजी स्कूल के बढ़ते हुए क्रेज के चलते हर साल दो चार नए स्कूल आ ही जाते हैं। एक व्यक्ति जो छोटे को चलाते थे, अपनी उद्यमिता के चलते स्थापित हुए, शहर से बाहर थोड़ी दूर पर बड़े कैम्पस में बैंक से लोन लेकर स्कूल की स्थापना की। नये सत्र के शुरू होने के पहले ही लाकडाउन हो गया। अब बैंक का कर्ज और ई एम आइ का भुगतान समस्या बन गयी है । ऐसे अनेकों उदाहरण हैं ।
बड़े स्कूल कर चुके उगाही
इसके विपरीत मिशनरी बेस्ड स्कूल /पूंजी वाला साधन सम्पन्न स्कूल ने फीस उगाही का नया तरीका ढूंढ निकाला। ऐसे स्कूलों ने अभिभावकों को संदेश भेज कर आनलाइन /वर्चूअल क्लास होने की सूचना दी और सीधे अपने खाते में फीस जमा लेने की व्यवस्था कर ली । इस तरह की व्यवस्था से 30-40 प्रतिशत बच्चे ही लाभान्वित हो पाए, लेकिन फीस सबों से वसूल लिए गए। ऐसी व्यवस्था साधनहीन स्कूलों द्वारा आयोजित नही की जा सकी , फलतः ऐसे स्कूल कोविड -19 से ज्यादा पीड़ित हुए ।
विभेदकारी नीति कब तक?
किसी भी क्षेत्र मे विभेदकारी नीति /फैसले अर्थव्यवस्था की दोषपूर्ण प्रणाली को दर्शाते हैं। अनलॉक अवधि मे अनेक क्षेत्रों को ढील दी गई। आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई ।कोरोना गाइड लाइन के साथ भीड़ वाले स्थान पार्क, रेस्टोरेंट, बिग बाजार एवं जिमखाना को भी खोलने की इजाजत दी गई, पर शिक्षा से जुड़े कोचिंग सेंटर एवं स्कूलों को इससे वंचित रखा गया । इससे जुड़े पढे-लिखे युवक-युवतियों को आर्थिक सहायता तो नही ही दी गई, उल्टे कर्ज की माहवारी किश्त के भुगतान हेके लिए दवाब बनाया गया, ताकि कर्ज एन पी ए में तब्दील न हो जाए। जबकि देश के कुल एन पी ए 10 लाख करोड़ रुपए का 50 प्रतिशत केवल एक सौ बडे औद्योगिक घरानों के नाम है। इन औद्योगिक घरानों को न तो बैंक से कर्ज लेने में परेशानी होती है, और न ही बैंक कर्ज भुगतान में विलंब होने या न होने पर इनकी सम्पत्ति की कुर्की /जब्ती होती है। यह वभेदकारी रवैया भी दोषपूर्ण आर्थिक प्रणाली का हिस्सा है।
इसी तरह की विभेदकारी नीति से खिन्न होकर प्रो. मोहम्मद युनूस (ढाका विश्व विद्यालय, अर्थशास्त्र, विभाग) नोबेल पुरस्कार विजेता ने अपनी कमाई के रुपये से फुटपाथ पर काम करने वाली औरतों को कर्ज दिये। यही लोन 'माइक्रो फाइनेंस 'के नाम से विख्यात हुआ और उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया। मेरी मुलाकात उनसे 2017 में आचार्य नागार्जुन विश्व विद्यालय, गुन्टूर में हुई थी । उनसे हुई बातचीत की बात फिर कभी करेंगे । कहने का तात्पर्य यह है कि कमजोर तबके के लोगों को कर्ज बिना कालैटर्ल, यानी प्रतिभूति के नही मिलता है। यह आर्थिक विषमता को पैदा करती है।
निजी संस्थान क्यों ?
विगत डेढ -दो दशक में निजी स्कूल एवं कोचिंग सेंटर कुकरमुत्ते की तरह शहरों में उभरे हैं। अब तो इसका फैलाव छोटे कस्बे से लेकर गांव तक में हो रहा है। आइए, जाने इसकी वजह । सन् 1991 में उदारीकरण की नीति अपनाई गई । इसके चलते निजी निवेश ने सभी क्षेत्रों में जोर पकड़ा और शिक्षा जगत भी इससे अछूता नही रहा। यह तो तकनीकी, इन्जीनियरिन्ग, मेडिकल एवं प्रबंधन के क्षेत्रों की बात।
लेकिन सामान्य शिक्षा में भी निजी संस्थानों के बहुतायत में होने के क्या कारण हैं?
►सबसे महत्वपूर्ण कारण तो सरकारी संस्थानों की आवश्यकता की दृष्टि से अपर्याप्त संख्या में होना है ।
►दूसरे, शिक्षा के स्वरूप में विशाल परिवर्तन । इस विशाल परिवर्तन के अनुरूप हमारी सरकारी व्यवस्था सक्षम नहीं है। वर्तमान समय की शिक्षा आवश्यकता को देखते हुए हमारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था सक्षम नही है।
►तीसरे, इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो हमारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था के पास जो उपलब्ध इन्फ्रास्ट्रक्चर है वे अपर्याप्त तो हैं ही, साथ ही उसके कार्यान्वयन हेतु योग्य प्रशिक्षित शिक्षक नही है, जबकि निजी संस्थान इस दृष्टि से पूर्ण नही तो बेहतर अवश्य है। इतनी बात तो स्पष्ट है कि आज मध्यम वर्ग के लोग भी अपने बच्चे को अच्छी तालीम देना चाहते हैं,ताकि इस तीव्र प्रतियोगितात्मक व्यवस्था में survive कर सके।
►चौथे, निजी संस्थानों में शिक्षक विषयवार होते है, पर्याप्त संख्या में होते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की दोनों दृष्टिकोण से कमी ही नही, घोर कमी होती है। इन कारणों के चलते निजी स्कूलों तथा कोचिंग संस्थानों की उत्पत्ति और वृद्धि हुई ।
गाइडलाइंस के तहत खुलने चाहिए संस्थान
कोचिंग संस्थान विश्व विद्यालय से लेकर स्कूल तक के छात्रों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप विषय सामग्री मुहैया कराते हैं। कोचिंग सेंटर केवल सामान्य शिक्षा में ही नही, बल्कि प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी भी करवाते हैं । पिछले एक साल में इससे जुड़े स्थानीय बच्चे काफी suffer किए हैं। स्पष्ट है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में इन संस्थानों की अपनी भूमिका है । अतः ये संस्थान भी गाइडलाइंस के तहत खुलने चाहिए ,ताकि इससे जुड़े शिक्षक सामान्य जिन्दगी जी सकें और छात्र अपना कैरियर बना सकें ।
यद्यपि मैं अपनेतयी दो शिक्षा व्यवस्था का विरोधी हूं, क्योंकि एक ही समाज में दो तरह की शिक्षा व्यवस्था सामाजिक एवं आर्थिक असमानता पैदा करती है। इस पर फिर कभी चर्चा करूंगा।


