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सावन आया, इस सावन के मायने !

उमेश कुमार  Written By:उमेश कुमार

देवघर।

देवघर में इस बार एक अलग तरह का सावन उतरा है. उमड़ते बादलों में एक अलग सी रंगत है और बरसती बूंदों में एक नई खनक. कोरोना के कारण केसरिया प्रवाह की राह रोक दी गई है. आस्था पर पुलिस के पहरे हैं. यहीं सावन और आस्था का मूल सवाल कौंध रहा है.

क्या आस्था किसी मेले की मोहताज है?

क्या आस्था को आर्थिक सवालों या फिर किसी विशेष प्रकार के मेले से जोड़ कर ही देखा जा सकता है?

आस्था के इस जोड़-घटाव को कायदे से समझने के लिए हमें एक बार गांधी की मशहूर किताब 'हिंद स्वराज' (1909 ई.) के कुछ पन्ने पलट लेने चाहिए. इस किताब में गांधी ने साफ लिखा है कि हिन्दुस्तान को रेलों ने, वकीलों ने और डाक्टरों ने कंगाल बना दिया है! यह विलक्षण है कि कोरोना वायरस के कारण इन तीनों का देवघर से गजब का संदर्भ जुड़ रहा है. गांधी ने लिखा है कि पहले जब रेलें नहीं थीं तब लोग बड़ी मुसीबत से वहां (किसी धार्मिक केंद्र) जाते थे. गांधी बड़ी तीव्रता से उकेरते हैं कि ऐसे लोग वहां सच्ची भावना से ईश्वर को भजने जाते थे; अब तो ठगों की टोली सिर्फ ठगने के लिए जाती है. गांधी यह भी जोड़ते हैं कि रेल से दुष्टता बढ़ती है. बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं.

मौजूदा हिन्दुस्तान के नजरिए से गांधी के विचारों की पुनर्समीक्षा बिल्कुल स्वाभाविक है. पर, इतना तो तय है कि रेलों से कोरोना वायरस के फैलने का खतरा अब भी बदस्तूर है. झारखंड में कोरोना के पहले केस में रेल की भूमिका पहले ही स्पष्ट हो चुकी है. झारखंड हाईकोर्ट के बहाने वकीलों की भागीदारी भी सामने आ चुकी है. अलबत्ता, गांधी की नजरों में 'मरीजों को झूठी लाली देनेवाले' डॉक्टर्स इस वैश्विक आपदा के सबसे बड़े रहनुमा साबित हुए हैं. लेकिन, यहां भी गांधी मौजूद हैं, क्योंकि डॉक्टर्स रोग का  इलाज तो कर रहे हैं, पर रोग के कारणों की ओर शायद उनका ध्यान नहीं है.

इस प्रसंग में हमें गांधी से ही आस्था के सावन का मतलब समझना चाहिए. गांधी आस्था को नितांत आंतरिक वस्तु मानते हैं.एक अंतर्धारा जो ईश और भक्त को भावना के स्तर पर जोड़ती है. कर्मकांड इसका बाहरी निकष है.यह एक खोज है जिसकी मंजिल हमारे मन का अतल है. कहा भी गया है 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'. लेकिन, जैसे ही हम ईश्वर की कोई खास जगह मुकर्रर कर लेते हैं, वैसे ही वहां व्यवस्था के नाम पर पेशेवर लुटेरे दाखिल हो जाते हैं! वे हमारी अज्ञानता और भोलेपन का भरपूर शोषण करते हैं. हर अवसर को मुनाफे की चाशनी में पगा लेने में माहिर कारोबारी अपने मतलब से पाला बदलते रहते हैं. ऐसे में कोरोना के खौफ में लिपटा यह सावन हमें आस्था का सार-तत्व भी जता रहा है.

ईश की तलाश हम अपने अंदर करें. मन को ही मंदिर माने. मंदिर की शुचिता को अपने आचरण में उतारें. जिन गुणों ने ईश को गढ़ा है, उन्हें पूरी तरह आत्मसात न भी कर सकें तो कम-से-कम उसके आस-पास से तो जरूर गुजरें.इसी में असली खुशी और सुरक्षा दोनों है.

लेखक उमेश कुमार , झारखण्ड शोध संस्थान देवघर के सचिव हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं। 

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