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डायलिसिस स्टेज में जाने वाले किडनी मरीजों के इलाज में मददगार साबित होगा RIMS का रिसर्च

रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में हुए एक रिसर्च की बदौलत किडनी के मरीजों के डायलिसिस स्टेज तक पहुंचने का अंतराल बढ़ाया जा सकेगा।

Ranchi: किडनी की बीमारी के चलते डायलिसिस स्टेज में पहुंचने वाले मरीजों के लिए यह राहत की खबर है। रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में हुए एक रिसर्च की बदौलत किडनी के मरीजों के डायलिसिस स्टेज तक पहुंचने का अंतराल बढ़ाया जा सकेगा। इस रिसर्च को अमेरिका के द जर्नल ऑफ वैस्कुलर एक्सेस ने मान्यता देते हुए हाल में प्रकाशित किया है।

रिम्स में लगभग आठ महीने तक किये रिसर्च के नतीजे के मुताबिक किडनी मरीजों में डायलिसिस स्टेज का अनुमान लगाते हुए पहले से उनके हाथ या पांव में एवी-फिस्टुला की सर्जरी करने से बेहतर परिणाम सामने आते हैं। मरीजों के क्रिएटनिन लेवल की नियमित तौर पर जांच से चिकित्सक सामान्य तौर पर यह अनुमान लगा लेते हैं कि किस मरीज को कब से डायलिसिस पर जाने की जरूरत होगी। जब मरीज का क्रिएटनिन लेवल 4.5 से 5 हो तभी एवी-फिस्टुला बना देने से डायलिसिस का अंतराल बढ़ जाता है।

रिसर्च टीम की अहम सदस्य नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ प्रज्ञा पंत ने बताया कि सामान्यत: किडनी के मरीज का जीएफआर (ग्लोमरूलर फिल्टरेशन रेट)20 के नीचे जाने परडायलिसिस के लिए एवी-फिस्टुला हाथ या पैर की नस में बनाया जाता है। लेकिन रिसर्च से यह नतीजा सामने आया है कि फिस्टुला बनाने की सर्जरी पहले कर लेना ज्यादा लाभप्रद है। इससे डायलिसिस स्टेज का अंतराल बढ़ाया जा सकता है।

रिम्स में हुए इस रिसर्च के लिए जो डेटा एनालिसिस किया गया, उसमें दुनिया के छह देशों कोरिया, इंग्लैंड, स्वीडेन, यूएसए, कनाडा और जापान के लगभग 3800 मरीजों के आंकड़े शामिल किये गये। डेटा का विभिन्न स्तरों पर विश्लेषण के बाद शोध के जो नतीजे आये, उससे किडनी मरीजों के इलाज में डॉक्टरों पर ज्यादा सहुलियत होगी। डायलिसिस के पहले वे उचित समय पर एवी-फिस्टुला की सर्जरी का निर्णय ले पायेंगे। डायलिसिस का समय बढ़ने से मरीज को भी राहत होगी। रिम्स के डायरेक्टर डॉ कामेश्वर प्रसाद की अगुवाई में हुए इस रिसर्च में डॉ प्रज्ञा पंत, डॉ अमित और डॉ पीजी सरकार शामिल थे।

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