
कोरोना संक्रमण के कारण लोग न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी पीड़ित हैं। इसके अलावा कोरोना काल ने बच्चों को भी मेंटली प्रभावित किया है। लगभग सवा साल से स्कूल बंद हैं। संक्रमण के डर से पैरेंट्स उन्हें बाहर भेजने से कतरा रहे हैं। इसके चलते बच्चे घरों में कैद हो गए हैं। खेलना-कूदना और यार-दोस्तों से मेल-मुलाकात न होेने से वे अंतर्मुखी और चिड़िचड़े हो गए हैं। उनका ज्यादातर समय मोबाइल फोन, कम्प्यूटर-लैपटॉप के साथ ही बीत रहा है। भूख न लगना, स्वभाव में जिद्दीपन, नींद न आना, देर से सोना और उठना, पैरेंट्स से बहस करना जैसी समस्याएं बच्चों में सामने आ रही हैं। इन समस्याओं के निदान के बारे में बता रहे हैं डॉक्टर दिनेश चौधरी। उनका कहना है कि घर में कोरोना से जुड़ी खबरों को लेकर पैरेंट्स चर्चा न करें। इस बीमारी से डरने के बजाय बच्चों को उससे बचाव के उपाय समझाएं। सकारात्मक माहौल घर में बनाएं। पढ़ाई के बाद बच्चों को उनकी क्रिएटिवटी के लिए प्रोत्साहित करें। उसे म्यूजिक, आर्टवर्क की ओर प्रमोट करें। इसके साथ ही नियमित रूप से फिजिकल एक्सरसाइज परिवार के सभी लोग करें।

उनके साथ खेलने का समय तय करें

बच्चों को बताएं कि रोज इतना समय हम साथ खेलेंगे जैसे आधा घंटा, एक घंटा। इस दौरान मम्मी-पापा कुछ और नहीं करेंगे, बस बच्चों के साथ खेलेंगे, ऐसा तय करें और पूरी कड़ाई से इसका पालन करें। यह वायरस फ्री टाइम होगा यानी इस दौरान मोबाइल, लैपटॉप और टीवी बंद रहेंगे। खेल के दौरान बच्चों को ईमानदारी, हार-जीत को सामान्य तौर पर लेना, सबको बराबरी से मौक़ा देना और समय की कीमत समझना जैसे मूल्य सिखा सकते हैं।
बच्चों के साथ काम करें
लॉकडाउन के दौरान घर के कामकाज में बच्चों को शामिल करें। उन्हें कुछ ऐसे काम सौंपे जिससे उनको जिम्मेदारी का अहसास हो। वे खुद को परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा समझें। पौधों को पानी देना, गाड़ी की सफाई, बिस्तर ठीक करना, बर्तन जमाना, कमरे में सामान को करीने से रखना ये काम उन्हें सौंपे जा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें खुद का डेली का टाइम-टेबल बनाने के लिए कहें और उसी के अनुसार ही काम करने की आदत डालें। इस तरह उनमें आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता आएगी। यदि ये महसूस हो कि बच्चा काफी मानसिक तनाव से गुजर रहा है तो जरूरत के मुताबिक किसी साइकोलॉजिस्ट की मदद भी ले सकते हैं।


