नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने बिल्डरों की मनमानी पर और सख्त नकेल कस दी है।

जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस इंदु मलहोत्रा की पीठ ने अपने फैसले में साफ कहा कि बिल्डर का एकतरफा करार और मनमानी अब नहीं चलेगी क्योंकि जब घर खरीदार किस्तें या बकाया रकम देने में मजबूर होता है तो बिल्डर उस पर जुर्माना लगाता है और भुगतान करने को बाध्य करता है, लेकिन बिल्डर समय पर घर का पजेशन यानी कब्जा ना दे तो उस पर जुर्माना क्यों नहीं?

घर खरीदारों के हितों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि घर खरीदार एक तरफा शर्त मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि एग्रीमेंट की एकतरफा शर्त को मानने के लिए डेवलपर्स किसी भी घर खरीदार को बाध्य नहीं कर सकता है।
9 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने होंगे पैसे
सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि समय रहते प्रोजेक्ट की डिलीवरी नहीं देने की हालत में बिल्डर को बगैर किसी लाग लपेट के होम बायर को पूरा पैसा लौटाना पड़ेगा। एक याचिका में सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायलय ने साफ कर दिया है कि अगर बिल्डर ने प्रोजेक्ट को समय से पूरा कर के डिलीवरी नहीं दिया तो बिना किसी बहस के उसे घर खरीदार को पूरे पैसे वापस देने होंगे। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ये पैसे 9 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने होंगे।
यह सुनवाई गुरुग्राम के प्रोजेक्ट को लेकर की जा रही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ये अहम फैसला सुनाया है।
बता दें कि देश की सबसे बड़ी अदालत में डेवलपर के द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। डेवलपर ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के आदेश के खिलाफ दायर की थी। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने डेवलपर को आदेश दिया था कि प्रोजेक्ट में बहुत ज्यादा देरी होने और कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं लेने की वजह से घर खरीदारों को उनका पूरा पैसा वापस करे।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि करार एकतरफा है साथ ही यह उपभोक्ता कनून, 1986 के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार है और इस तरह की शर्त करार में डालना धारा 2(1)(आर) के खिलाफ है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि घर खरीदार रेरा के साथ-साथ उपभोक्ता अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है।


