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कब सुनी जायेगी व्यवसाय जगत की पीड़ा , लॉकडाउन में चरमराई अर्थव्यवस्था

आलोक   Written By: आलोक कुमार मल्लिक

देवघर 

कोरोना संक्रमण की आपदा से पूरा देश जूझ रहा है और व्यवसाय जगत भी इससे अछूता नहीं है। वैश्विक आपदा और इसके कारण लॉक डाउन की परिस्थितियों में एक तरफ खाद्यान्न, दवा एवं अन्य किराना तथा आवश्यक वस्तुओं से जुड़े व्यवसायी भय के माहौल में भी कोरोना योद्धा की तरह अपने कर्तव्यों का अनुपालन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अन्य सभी व्यवसायी लम्बे पूर्ण तालाबन्दी के कारण घबराहट और इससे कैसे उबरा जाय, की चिन्ताओं से परेशान हैं। लॉक डाउन के कारण अर्थव्यवस्था चरमरा कर रह गई है। 

इस समय सभी वर्ग के व्यापारी असमंजस में हैं कि कैसे इससे उबरा जाय। अब तक सरकार ने सही मायने में व्यापारियों के लिये कोई राहत की घोषणा नहीं की है, उल्टे व्यापारी सहम रहे हैं कि क्या हम फिर इंस्पेक्टर राज की तरफ धकेले जायेंगे। 

विभिन्न स्तरों से श्रमिकों को तालाबन्दी के पूरे अवधि में मानदेय देने का दबाव तथा नौकरी से नहीं निकालने की सलाह दी जा रही है। मार्च महीने का पूरा मानदेय तो दिया जा सकता है, लेकिन उसके बाद बिना उपार्जन या व्यवसायिक गतिविधियों के लघु एवं मध्यम व्यवसायियों के लिए मानदेय दे पाना आसान नहीं है। हां आपसी तालमेल से हम अपने कर्मियों को उनकी आवश्यक जरूरतों भर पैसे दे सकते हैं तथा उन्हें काम से नहीं निकालने का वादा किया जा सकता है। सरकार को भी यह समझने की जरूरत है।

22 मार्च 2020 के बाद से जो स्थिति है और अभी जो थोड़ी बहुत उद्यम को खोलने की कवायद की जा रही है, इससे तुरन्त में व्यवसायों के पटरी पर आने का कोई बड़ा परिवर्तन सम्भव नहीं है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में व्यावसायिक गतिविधियों को पटरी में आने में कम से कम 6 महीने लगेंगे और सामान्य गतिविधि होने में एक-डेढ़ वर्ष लगेंगे। ऐसे में अगर व्यवसाय जगत को कुछ राहत और प्रोत्साहन नहीं मिला तो अर्थव्यवस्था बेपटरी होना लाजिमी है। 

► स्थानीय राज्य सरकारों को कम से कम लॉक डाउन अवधि तथा उसके बाद अगले 3 महीने तक बिजली बिल में मिनिमम गारंटी फिक्स्ड चार्ज से मुक्त करना ही होगा। व्यापार पूरी तरह शट डाउन की स्थिति में भी यह फिक्स्ड चार्ज कहीं से भी व्यापारियों को बचाने के हित में नहीं है। स्थानीय नगर निगमों और नगर निकायों में कम से कम एक वर्ष तक सभी तरह के टैक्स माफ कर दिए जांय तथा विभिन्न तरह के रिन्युअल और लाइसेंस की समयावधि स्वतः एक वर्ष के लिये बढ़ा दिया जाय।

► भारत सरकार तथा वित्त मंत्रालय को व्यापारियों की दूसरी बड़ी मांग कम से कम 3 से 6 माह के लिए उनके टर्म लोन, वर्किंग कैपिटल, ओवरड्राफ्ट तथा कैश क्रेडिट पर लगने वाले ब्याज को माफ करने का कदम उठाकर हमारी पीड़ा की मरहम-पट्टी की जानी चाहिये। उद्यमियों की जरुरत तथा मांग के अनुसार उनके वर्किंग कैपिटल, ओवरड्राफ्ट तथा कैश क्रेडिट की सीमा को 25% तक बिना किसी नए प्रोसेसिंग के बढ़ाये जाने का प्रावधान किये जाने की जरूरत है।

► हालांकि सरकार ने बैंकिंग व्यवस्था में भारी-भरकम राशि का प्रावधान किया है, लेकिन इससे सामान्य व्यवसायियों को कोई बड़ी राहत मिलने की सम्भावना नहीं है। अभी समय है अपने व्यवसायों को संभालने और पुनर्गठित करने की न कि नए लोन लेने की। एमएसएमई ने भी सीजीटीएमएसई में लोन गारंटी देने की अपनी सीमा को एक लाख हजार करोड़ से बढ़ाकर 5 लाख करोड़ कर दिया है। इससे एमएसएमई सेक्टर को दीर्घकालीन लाभ होगा लेकिन तात्कालिक लाभ की गुंजाइश कम ही दिखती है। इस आपदिक दौर में कुछ विशेष ट्रेड और उद्योग को लाभ होंगे। सामान्य व्यवसायियों के लिए तात्कालिक लाभ तथा राहत पैकेज की घोषणा वित्त, उद्योग तथा एमएसएमई मंत्रालयों को करनी चाहिये।

► लगभग डेढ़ महीने के लॉक डाउन के बाद सरकार अब कुछ उद्योग और दुकानों को खोलने की कवायद कर रही है। इस कवायद में प्रत्येक दूसरे दिन एडवाइजरी आती है जिसमें कई विसंगतियां और विरोधावास रह जाते हैं। पहले उद्योगों को खोलने की बात आई, लेकिन बिना ट्रेड के उत्पादन शुरू करना कम ही लोगों को समझ आई। श्रमिक यहां-वहां हो गए हैं और काम करने को तैयार नहीं, कच्चा माल और ट्रांसपोर्टेशन मिलना आसान नहीं। ट्रेड में कौन से दुकान और कहां खुलेंगे, इस पर विरोधावास है। अतः सरकार लॉक डाउन में ढिल को स्टैक होल्डर तथा व्यावसायिक संगठनों के साथ सम्यक विचार कर नीति और एडवाइजरी बनाएं ताकि इसके अनुपालन में सुगमता हो। छूट दिए जा रहे काम, ट्रेड और  उत्पादन में सामन्जस्य रहे।

► जरूरत है तो कुछ और अवधि के लिये लॉक डाउन रहे, लेकिन छूट और ढील देने के मामले में अफरातफरी न फैले। पूर्ण सोशल डिस्टेंसिंग और आवश्यक एहतियातों को पूरी तरह संचालित कर व्यापारी उद्यम कर सकने में समुचित सक्षम नहीं हो पायेंगे। वही काम हो जिसमें शासन और व्यापारी दोनों मिलकर व्यवस्था बनाने में सक्षम हों न कि सिर्फ व्यापारियों पर ही अनुपालन का दबाव हो।

► इसके अतिरिक्त जीएसटी, टीडीएस आदि मामलों पर भी व्यापारियों को समुचित लाभ दिया जाय। सरकार से अनुरोध है कि धैर्यपूर्वक व्यापारियों के हित में आवश्यक राहतों पर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लिये जांय। आखिर देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के मामले में उद्यम और व्यापार ही सर्वोच्च है। 

लेखक आलोक कुमार मल्लिक,फेडरेशन ऑफ झारखण्ड चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के संप क्षेत्रीय उपाध्यक्ष हैं . उक्त बातें लेखक के निजी विचार हैं .

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