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दिलचस्प होता जा रहा बोकारो के चारों विधानसभा सीटों पर चुनाव

By: अशोक अश्क 

बोकारो।

बोकारो जिला के चार विधान सभा क्षेत्रों में 2019 का विधान सभा चुनाव 2014 के विधान सभा चुनाव से अलग परिस्थिति में होने जा रहा है । 2014 में जहां एनडीए में शामिल चार दल एक साथ चुनाव लड़ रहे थे,  वहीं इस बार सभी दल अलग अलग चुनाव लड़ रहे है । जबकि, कांग्रेस,  राजद और जेएमएम साथ साथ चुनाव मैदान में हैं ।

जिले के चार विधान सभा क्षेत्रों,  बेरमो और बोकारो में कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव मैदान में  हैं तो चन्दनकियारी और गोनिया जेएमएम के खाते में गया है । कांग्रेस ने  बोकारो में यहां के पूर्व विधायक और राज्य के पूर्व मंत्री समरेश सिंह की छोटी बहू स्वेता सिंह पर दांव खेला है । हालांकि समरेश सिंह की बड़ी बहू डॉ़  परिन्दा  सिंह इस प्रयास में थी कि कांग्रेस से उसे टिकट मिले लेकिन टिकट पर कब्जा छोटी बहू ने कर लिया । समरेश सिंह के घर में उत्तराधिकारी को लेकर विवाद पहले से चलता आ रहा है । इस संदर्भ में समरेश सिंह ने इस विवाद को यह कर खत्म करने का दावा किया है कि यह तय हो गया है कि विधान सभा का चुनाव छोटी बहू स्वेता सिंह और चास नगर निगम के मेयर का चुनाव बड़ी बहू डॉ़  परिन्दा  सिंह लड़ेंगी  ।

विवाद खत्म होने का दावा भले ही किया जा रहा है लेकिन कहा जा रहा है कि मन के अंदर की पीड़ा खत्म नहीं हुई है । दूसरी तरफ कांग्रेस में कई नेता टिकट की आस लगाये बैठे थे जिन्हें निराशा हाथ लगी है । इसको लेकर जहां नाराजगी है वहीं बगावत भी देखने को मिल रही है ।कांग्रेस के कुछ नेता निर्दलीय  रूप से  चुनाव लड़ने जा रहे हैं । यहीं नही, कांग्रेस ने बोकारो विधान सभा सीट पर पहले संजय कुमार को टिकट और सिम्बॉल देकर फिर वापस ले लिया और वह टिकट स्वेता सिंह को दे दिया । इसे एक जाति विशेष का अपमान करने का आरोप लगा कर कांग्रेस के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुये सबक सिखाने की बात की जा रही है । उधर समरेश सिंह परिवार को टिकट दिये जाने को लेकर भी नाराजगी है,  खासकर विस्थापितों मे जिनका आरोप है कि बोकारो का कई बार प्रतिनिधित्व करने के बाद भी समरेश  सिंह ने विस्थापित समस्या का निदान नहीं किया । 

भाजपा  ने अपने निवर्तमान विधायक बिरंची नारायण पर दांव खेला है । 2014 के चुनाव में प्रदेश में सर्वाधिक मतों के अंतर से चुनाव जीतने के बाद भी इस बार एड़ी चोटी एक करना पड़ा । दरअसल बिरंची नारायण का एक अश्लील वीडियो वायरल होने की वजह से पार्टी ने टिकट देने में काफी देर लगा दी । हालांकि विधाायक की ओर से यह दावा किया गया कि वीडियो एडीटेड और फेक है । इस वायरल वीडियो की वजह से विधायक की शाख गिरी है जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है । बिरंची नारायण अपने पांच साल के कार्यकाल  में किये गये विकास को दिखाकर इस चुनाव  में अपनी नैया पार लगाने में जुटे हुये है । पिछले चुनाव में मोदी लहर में नैया पार हो गयी थी लेकिन इस बार परिस्थिति अलग है ।

इस बार वैसी मोदी लहर नजर नहीं आ रही है । इस बार का चुनाव मोदी का नहीं अपना चेहरा दिखाकर लड़ना होगा । उधर विपक्ष का वार भी लगातार जारी है । विकास का दंभ भरने वाले बिरंची नारायण पर अपने कार्यकाल में किये गये कई वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया जा रहा है । भाजपा के एक कद्दावर नेता राजेन्द्र महतो ने भाजपा छोड़कर आजसू का दामन थाम लिया है और आजसू  के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं । राजेन्द्र महतो कभी समरेश सिंह के साथ राजनीति करते थे लेकिन दोनों में ऐसी दूरियां बढ़ी कि वर्षों बाद भी ये खाई नहीं मिट सकी । अब राजेन्द्र महतो समरेश  सिंह के प्रतिद्वन्दी  के रूप में खड़े हैं । अगर राजेन्द्र महतो समरेश सिंह के ग्रामीण वोट बैंक में सेंधमारी करने में सफल हो जाते हैं तो इसका नुकसान कांग्रेस उम्मीदवार को ही होगा । राजेन्द्र महतो कांग्रेस के साथ साथ भाजपा उम्मीदवार के लिये भी सिरदर्द साबित होने वाले हैं । भाजपा  के कई नेता भी टिकट की आस में थे और प्रयासरत भी थे । ऐसे नेताओं को निराशा ही हाथ लगी है और भाजपा में भीतरघात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है ।

पिछली बार एनडीए गठबंधन में जनता दल युनाईटेड भी शामिल था लेकिन इस बार जनता दल युनाईटेड ने अशोक चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया है । अशोक चौधरी कई बार अच्छे मत प्राप्त कर चुनाव लड़ चुके हैं ।हालांकि हर बार वे जीत का माला पहनने से चूक गये । अशोक चौधरी पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल हो जायें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा ।

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में भी बगावत के स्वर सुनाया दे रही है । यह सीट गठबंधन में कांग्रेस को मिलने की वजह से जेएमएम के सक्रिय नेता और बोकारो के पूर्व विधायक असली राम महतो ने निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ने के लिये अपना नामांकन कर दिया है । इस वजह से गठबंधन का जो फायदा कांग्रेस प्रत्याशी  को मिलना चाहिये,  उसकी उम्मीद कम ही दिख रही है । 

आम आदमी पार्टी ने भी अपना उम्मीदवार खड़ा कर नोटों के विभाजन का रास्ता खोल दिया है । झारखण्ड विकास मोर्चा के उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में हैं । मोर्चा ने डॉ़ प्रकाश सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है । हाल के कुछ वर्षों में डॉ़  प्रकाश ने क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में कभी हद तक सफलता पायी है । लेकिन,  बोकारो विधान सभा क्षेत्र में झारखण्ड विकास मोर्चा का जनाधार बहुत ज्यादा नहीं होने के बाद भी डॉ़  प्रकाश अपनी जीत किस तरह सुनिश्चित करते हैं यह भविष्य के गर्भ में है । बोकारो  में जातिगत आधार पर लोगों के वोटों के ध्रुवीकरण  की कवायद भी तेज होती जा रही है । ऐसे में डॉ़  प्रकाश स्वेता सिंह के लिये घातक साबित हो सकते हैं ।

इन प्रत्याशियों के अलावा कई अन्य राष्ट्रीय और राज्य दलों के उम्मीदवारों के नामांकन का सिलसिला जारी है । बोकारो  में 16 दिसम्बर को मतदान होना है ।चुनावी शोर धीरे धीरे तेज होता जा रहा है । अपने वोट बैंक को बचाने और दूसरे के वोट बैंक में सेंधमारी करने की रणनीति को अंजाम देने में सभी प्रत्याशी तन , मन और धन से जुट गये हैं । देखना यह है कि बिरंची नारायण अपनी यह सीट बचा पाते हैं या कोई दूसरा इस सीट पर कब्जा कर लेता है । इतना तो तय है कि इस बार जिस तरह से पार्टियों और उम्मीदवारों की लाईन लगी है,  जीत हार का अंतर बहुत ज्यादा होने वाला नहीं है  जबकि 2014 में झारखण्ड में सबसे ज्यादा मतों के अंतर से बिरंची  नारायण ने जीत दर्ज की थी ।

 लेखक अशोक अश्क बोकारो के वरिष्ठ पत्रकार हैं। 

नमन

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