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Marital rape: स्त्री-पुरुष के अधिकारों का द्वंद

'मैरिटल रेप' अब सिर्फ एक शब्द नहीं, हाल के दिनों में स्त्री अधिकार और उसके विमर्श का केंद्र बन गया है। भारत जैसे उदार देश में एक तरफ तीन तलाक और हालाला जैसी कुप्रथाएं पुरुष के एकाधिकार को साबित करती हैं।

Written by: प्रभुनाथ शुक्ल

‘मैरिटल रेप’ अब सिर्फ एक शब्द नहीं, हाल के दिनों में स्त्री अधिकार और उसके विमर्श का केंद्र बन गया है। भारत जैसे उदार देश में एक तरफ तीन तलाक और हालाला जैसी कुप्रथाएं पुरुष के एकाधिकार को साबित करती हैं। वहीं, ‘मैरिटल रेप’ यानी वैवाहिक बलात्कार भी स्त्री अधिकारों का दमन है। यह सामाजिक विद्रूपता और कुरूपता है। इसके पीछे पुरुष एकाधिकार की गंध आती है। महिलाओं को सिर्फ समर्पण, त्याग, दया और ममता की प्रतिमूर्ति समझना कहाँ का न्याय है। स्त्री और पुरुष अर्धनारीश्वर हैं । दोनों के बिना किसी एक का अस्तित्व नहीं है। आधुनिक युग में जहाँ ‘लिव इन रिलेशन’ जैसी गैर सामाजिक संस्थाओं का उदय हो रहा है। वहीं, दूसरी तरफ वैवाहिक जीवन में सहमति और असहमति के बीच ‘सेक्स’ स्त्री और पुरुष के बीच द्वंद की दीवार बना है।

वैवाहिक जीवन में ‘बलात्कार शब्द’ का औचित्य ही नहीं होना चाहिए। विवाह जीवन की पहली सहमति है। वह स्त्री-पुरुष के आपसी समझौते का संस्थागत दस्तावेज है। दोनों के बीच ‘दैहिक संतुष्टि’ एक प्राकृतिक शाश्वत सत्य है। दैहिक संतुष्टि पर जितना प्राकृतिक अधिकार स्त्री का है उतना ही पुरुष का है। इस सत्य के पीछे सृष्टि संरचना का एक अनूठा संसार भी है। क्या हम ऐसे विवादों को खड़ा कर जीवन संरचना के ‘शाश्वत सत्य’ को ही मिटाने पर तुले हैं। क्या हम प्राकृतिक सत्य को ही नकारने पर अमादा हैं। वैवाहिक जीवन में ‘दैहिक संतुष्टि’ स्त्री-पुरुष का प्राकृतिक अधिकार है। इसे सिर्फ स्त्री विमर्श और उसके अधिकार के रूप में नहीं विश्लेषित किया जाना चाहिए। फिलहाल ऐसी बहस कितनी जायज है जब जीवन की निजी आजादी की आड़ में विवाह पूर्व ‘उन्मुक्त सेक्स’ की संस्कृति पनप रही है।

दिल्ली उच्च न्यायालय में ‘मैरिटल रेप’ यानी वैवाहिक बलात्कार का मामला लंबित है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था। लेकिन सरकार इस मामले में अदालत से अभी लंबा वक्त चाहती है। अदालत उसके लिए तैयार नहीं दिखती है, उसने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जबकि केंद्र सरकार सभी राज्यों और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं से इस पर विमर्श चाहती है। स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर वर्षों पुराना कानून बदले परिवेश में अप्रासंगिक हो चला है। ‘मैरिटल रेप’ को अपराध घोषित कर दिया गया तो विवाह नाम की संस्था खतरे में पड़ जाएगी। समाज में एक नई तरह की समस्या पैदा हो जाएगी। देश में बलात्कार को लेकर भी तमाम कानून बने हैं उस स्थित में क्या हम बलात्कार जैसे घिनौने कृत्य पर प्रतिबंध लगा पा रहे हैं। लेकिन हम यह भी नहीं कहते हैं कि स्त्री अधिकारों की रक्षा न हो। फिलहाल इस तरह के कानून से विवाह जैसी संस्था के लिए खतरा बढ़ेगा।

स्त्री-पुरुष के जीवन में ‘बलात ‘शब्द की कोई जगह ही नहीं है। विवाह कोई ‘कांट्रैक्ट’ नहीं है। यह जीवन जीने की पद्धति है। जीवन में सब कुछ सेक्स है, यह भी गलत है। सेक्स यानी यौन संतुष्टि जीवन का आनंद और सृष्टि का सर्जक है। कुलीन स्त्री-पुरुष के संस्कारित जीवन में सहमति और असहमति की बात ही नहीं पैदा होती। जीवन में तमाम ऐसे वक्त और मोड़ आते हैं जहां सेक्स बहुत कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता। वैवाहिक संस्था गौण हो जाती है और परिवार प्रथम होता है। यह देश, काल, वातावरण और परिस्थिति जन्य हालात पर निर्भर करता है।

संविधान में ‘मैरिटल रेप’ अपराध की श्रेणी में नहीं है। पुरुष के खिलाफ इस पर किसी सजा का प्रावधान नहीं है। वैवाहिक जीवन में ‘सेक्स’ जीवन का आनंद है। लेकिन सेक्स में स्त्री और पुरुष की सहमति आवश्यक है। क्योंकि ‘यौन संतुष्टि’ जीवन की संतुष्टि है। फिर इसमें असहमति का प्रवेश ‘मैरिटल रेप’ में आता है। इस मुद्दे को एक विवेकशील स्त्री-पुरुष आपस में समझ सकते हैं। अदालत का एक फैसला सिर्फ कानून बन सकता है लेकिन जीवन में सहमति और संतुष्टि नहीं पैदा कर सकता।

वैवाहिक जीवन की सफलता, संतानोत्पत्ति, संतान सुख और विभिन्न बातें जीवन की सफलता के आयाम है।जबकि यौन संतुष्टि स्त्री-पुरुष के सुखमय जीवन और पारिवारिक का परिपथ है। ऐसी स्थिति में हम यौन संतुष्टि को जीवन से अलग नहीं कर सकते हैं। विवाह जैसी पवित्र संस्था में प्रवेश के बाद ही स्त्री-पुरुष का जीवन परिवार नामक की संस्था में प्रवेश करता है। उस संस्था को सृष्टि परिवार नामक संस्था में बदलकर देश और समाज का निर्माण करती है। स्त्री-पुरुष के जीवन में असहमति तमाम दुष्परिणामों का फल देती है। यौन संतुष्टि के लिए स्त्री को सिर्फ सेक्स की मशीन नहीं समझना चाहिए। मेरा जहाँ तक ख्याल है संस्कारित जीवन में ऐसी बातें होती भी नहीं हैं।

वैवाहिक जीवन में हमें स्त्री के अधिकार की संपूर्ण रक्षा करनी चाहिए। पुरुष, स्त्री पर एकाधिकार चाहता है। जबकि अब परिवेश बदल गया है स्त्री स्वावलम्बी हो चली है उस हालात में वह पुरुष के एकाधिकार पर खुद को क्यों समर्पित करेगी। जब उसका पति रोज नशे में घर पहुँचता है और खुद की यौनिक संतुष्टि को जीवन की मंजिल मानता हो। उसके लिए स्त्री की भावनाएं और बाल-बच्चे और परिवार की समस्याएं कोई मायने नहीं रखती। हालांकि ‘मैरिटल रेप’ को अगर अदालत कानूनी मान्यता देती है तो स्त्री अधिकार को कानूनी रक्षा कवच मिल जाएगा, लेकिन इससे सामाजिक विद्रूपता फैलने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

‘मैरिटल रेप’ स्त्री-पुरुष के बीच एक मनोविकार है। जीवन में संतुष्टि का आनंद तभी मिलता है जब स्त्री और पुरुष के बीच सहमति होती है। इस तरह की संतुष्टि सेक्स को कई गुना बढ़ाती है। लेकिन असहमति में तमाम विद्वेष और विकारों को जन्म देती है। इस तरह की हरकत से स्त्री की निगाह में पुरुष गिर जाता है। उस स्त्री की नजरों में देवता बना पति दानव बन जाता है। पुरुष को इस तरह के हालात से बचना चाहिए। वैवाहिक संस्था का यह शर्मनाक पहलू है। जब यौन संतुष्टि यौन हिंसा में बदल जाए तो स्त्री-पुरुष संबंध अच्छे नहीं हो सकते। सफल वैवाहिक जीवन में यौन हिंसा का कहीं स्थान नहीं होना चाहिए। यौन हिंसा ही तलाक और दूसरे मुद्दों का कारण बनती है।

भारत में 29 फीसदी महिलाएं वैवाहिक जीवन में यौन हिंसा का शिकार है। गांव और शहर में इसका अंतर साफ-साफ दिख सकता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के एक आंकड़े अनुसार यौन हिंसा का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलता है। ग्रामीण इलाकों में 32 फीसदी और शहरों में 24 फीसदी महिलाएं वैवाहिक जीवन में यौनिक हिंसा की शिकार हैं। महिलाओं को ऐसी हिंसा से बचने के लिए डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट ( घरेलू हिंसा कानून) भी है।

दुनिया के 185 देशों में सिर्फ 77 में ‘मैरिटल रेप’ पर कानून बना है। बाकी 108 देश में 74 देश ऐसे हैं जहां महिलाओं को रिपोर्ट दर्ज कराने का अधिकार है। भारत के समेत 34 देशों में मैरिटल रेप को लेकर कोई कानून नहीं है। आधुनिक परिवेश में यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। क्योंकि विवाह नामक संस्था को बनाए रखना भी हमारी सामाजिक चुनौती है। हम एक अच्छी स्त्री चाहते हैं, लेकिन हमें एक अच्छा पुरुष भी बनना होगा। अदालत के किसी भी फैसले का असर समाज पर दूरगामी हो सकता है। सरकार और संवैधानिक संस्थाओं को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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