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कोरोना का असर वकालत पर?

साल 2020, 2021 चुनौती भरा साल था,कोरोना महामारी ने अधिवक्ता समाज के अस्तित्व को बड़ी चुनौती पेश की, पर हम सब उससे पार पाने में सफल रहे हैं

By Nitish Kumar Singh

इतिहास इस बात की गवाही देता हैं कि कोरोना काल अधिवक्ता वर्ग को लगातार खराब स्थितियों में ले गया है। जैसे तैसे 2021 विदा हुआ और हम 2022 में प्रवेश कर गये हैं,साल 2020, 2021 चुनौती भरा साल था,कोरोना महामारी ने अधिवक्ता समाज के अस्तित्व को बड़ी चुनौती पेश की, पर हम सब उससे पार पाने में सफल रहे हैं, जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर आ गयी थी कि 2022 की शुरुआत में ही हमें वायरस के ओमिक्रोन वैरिएंट से दो चार होना पड़ रहा है.

जिसने फिर से न्यायालयों में वर्चुअल मोड की आहट दे दी हैं जिसकी शुरुआत माननीय सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने दो सप्ताह के लिए सुनवाई वर्चुअल मोड में करने की घोषणा से कर दी हैं,इससे मेरा मानना है कि वकालत पर तालाबंदी लग जायेगी ,इसके पीछे मेरा तर्क यह है कि कोरोना काल में युवाओं के इस क्षेत्र में झुकाव कम हुआ है, अधिवक्ताओं की संख्या में उत्तरोत्तर कमी आ रही  है‌। आज देश में लगभग 25 लाख के आस-पास पंजीकृत अधिवक्ता हैं। बहुसंख्यक अधिवक्ताओं की आर्थिक स्थिति दैनिक मुकदमों की सुनवाई पर ही निर्भर रही है।

सेवा क्षेत्र होने के बावजूद मुकदमों की पैरवी से मिलने वाली फीस ही अधिवक्ता परिवारों के जीविकोपार्जन का साधन है। कोरोना महामारी में वर्चुअल मोड़ के कारण न्यायालय की फीजिकल बंद हो गये।  न्यायालयों में कार्य ठप होने के कारण अधिवक्ता परिवारों की स्थिति आज आर्थिक रूप से चिंतनीय हो गयी है। तालाबंदी के उस कालखंड में बहुसंख्यक अधिवक्ताओं के परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि संबंधित राज्य बार कौंसिल को उन परिवारों को दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी कुछ सहायता राशि का आवंटन करना पड़ा था, परंतु यह सहायता राशि इतनी पर्याप्त नहीं थी कि अधिवक्ता परिवारों की आर्थिक स्थिति ठीक हो सके। अधिवक्ताओं की सामाजिक सुरक्षा का भी विषय बार-बार उठता रहा है।

कुछ राज्यों ने तो अपने अधिवक्ताओं के लिए स्वास्थ्य बीमा का प्रयोजन किया है परंतु बहुत से राज्यों में अभी भी ऐसी स्थिति नहीं है। कुछ राज्यों की बार काउंसिल ने वृद्ध अधिवक्ताओं के पेंशन की भी व्यवस्था का प्रावधान किया है। लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि अधिवक्ता परिवारों के स्वास्थ्य बीमा, सावधि बीमा और पेंशन की एक केंद्रीयकृत व्यवस्था हो, जिससे अधिवक्ता परिवारों को सामाजिक सुरक्षा मिल सके। 

उच्चतम न्यायालय ने वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा लाकर तकनीकी रूप से अक्षम, जिनकी संख्या बहुमत से भी ज्यादा है, अधिवक्ताओं को और पंगु बना दिया है। वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा पर अपने देश में काम करना वकीलों के लिए बहुत ही दुष्कर कार्य है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी उच्चतम न्यायालय को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि न्यायालयों को पूर्व की भांति ही खोल कर कार्य कराया जाए क्योंकि वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा भारत में अभी संभव नहीं है। महानगरों में भी वर्चुअल कोर्ट ठीक ढंग से नहीं काम कर पा रहे हैं, इसकी भी शिकायतें लगातार आ रही हैं। वर्चुअल कोर्ट के लिए एक सामान्य अधिवक्ता को भी कंप्यूटर या लैपटॉप, इंटरनेट और एक कार्यालय की आवश्यकता होगी जोकि देश के 90 प्रतिशत अधिवक्ताओं के पास नहीं है।

वर्तमान परिस्थिति में यदि उनको यह सारी व्यवस्था करनी पड़ेगी तो एक सामान्य अधिवक्ता के लिए यह बहुत कठिन होगा क्योंकि इसके लिए अतिरिक्त वित्त की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान परिस्थितियों में संभव नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमें कुछ वर्ष तक कोरोना के साथ ही जीना होगा और इसी में से रास्ता निकालना होगा।इसी संभावना,आशंका को लेकर मैने माननीय उच्चतम न्यायालय वो उच्च न्यायलय पटना को नंवबर 2020 एवम जुलाई 2021 को पत्र के माध्यम से सुझाव दिया था,जिसके अनुसार मेरा पहल वो सुझाव है, कि एक “ग्रेडेड एक्शन प्लान” बनाया जाए जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं की मैं सिफारिश किया था वो करता हूँ जिससे न्यायालयों को सुचारू रूप से संचालन के लिए शामिल किया जा सकता है: –

1. उच्च न्यायालय एवं जिला न्यायालयो में अलग प्रवेश और निकास द्वार होना चाहिए और प्रत्येक प्रवेश द्वार पर COVID परीक्षण उपकरणों और स्वच्छता सुरंग से सुसज्जित होना चाहिए।

2. उच्च न्यायालय में तीन अलग-अलग इमारतें हैं और विभिन्न जिला न्यायालयों के पास बड़ी-बड़ी इमारतें हैं  इसलिए सभी न्यायालयों के कोर्ट हॉल को बड़ा तथा उनके के बीच काफी दूरी रखते हुए कोर्ट फंक्शनिंग अलग-अलग कोर्ट कॉम्प्लेक्स से शुरू हो सकती है और जिला न्यायालयों के लिए भी यही दिशा-निर्देश दिए जा सकते हैं।  इस प्रकार, अधिक से अधिक मामलों की सुनवाई उच्च न्यायालय के साथ-साथ जिला न्यायालयों में एकल पीठ की संख्या में वृद्धि करके शुरू की जा सकती है।

3. कोर्ट रूम में, कमरे के आकार को ध्यान में रखते हुए, कुर्सियों को दूरी पर रखा जाना चाहिए और न्यायाधीश और वकील के बीच 5-6 फीट की दूरी होनी चाहिए और समान मानदंडों को सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट की सुनवाई के लिए जिला न्यायालयों में बिग कोर्ट हॉल खोले जा सकते हैं।

4. प्रत्येक मामले की सुनवाई का समय तय किया जाना चाहिए और उनकी अगली सुनवाई के लिए 2-3 मिनट का समय अंतराल होना चाहिए ताकि संबंधित अधिवक्ता अदालत कक्ष के अंदर आ सकें।

5. प्रत्येक न्यायाधीश को कुछ मामलों को चिह्नित किया जाना चाहिए और प्रत्येक अधिवक्ता को अपने मामले में अपने तर्क रखने की संभावित अवधि के बारे में अपनी फाइल पर उल्लेख करना चाहिए और मामला दर्ज होने के दो दिन बाद और मामले की सुनवाई के बाद मामले को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।  यदि मामले में अधिक समय लगता है तो कारण सूची में दिए गए अगले मामले को कारण सूची में दिए गए समय पर कॉल किया जा सकता है और शेष भाग सुने हुए मामले को बोर्ड के अंत में लिया जाना चाहिए।

6. जहां तक ​​संभव हो मामलों में सुनवाई शुरू करने और नए मामलों में, केवल अधिवक्ता को मामले में प्रतिनिधित्व करने की अनुमति देने के प्रयास किए जा सकते हैं।

7. प्रत्येक पक्ष के लिए केवल दो अधिवक्ताओं को उसी तरह से अनुमति दी जा सकती है जैसे कि एक वरिष्ठ पदनाम अधिवक्ता ब्रीफिंग वकील के साथ दिखाई देते है।जिन मामलों में पक्षकारों की संख्या अधिक है, उन मामलों में प्रत्येक पक्ष के लिए केवल एक अधिवक्ता को अनुमति दी जा सकती है।

8. मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को ग्लास शील्ड और माइक की व्यवस्था प्रदान की जानी चाहिए, यदि आवश्यक हो तो न्यायाधीशों के साथ-साथ वकीलों के लिए भी ऐैसी व्यवस्था बनाई जाए।

9. एक अधिवक्ता जिसका मामला सूचीबद्ध नहीं है, को कोर्ट हॉल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

10. कोर्ट हॉल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए प्रावधान होना चाहिए और लिटिगैंट के अनुरोध पर, उसी की सीडी पार्टी / अधिवक्ता को कुछ राशि के भुगतान पर दी जा सकती है।

11 न्यायालय की सुनवाई की लाइव कार्यवाही का प्रावधान जल्द से जल्द किया जाए जो भविष्य में कोर्ट हॉल में भीड़भाड़ को कम करने के लिए उपयोगी होगा क्योंकि लिटिगैंट अपने मोबाइल पर बहुत अच्छी तरह से देख सकते हैं।

12. न्यायालय परिसर के कैंटिनों को चैम्बर डिलिभिरी सेवा देनी चाहिए जिससे अनावश्यक भीड़ कम हो सके।।

13। वकीलों को सीमित रूप से, नंबर फ्लोरवाइड, तारीख और समय तक सीमित रखते हुए, सीमित रूप से सभी कोर्ट कॉम्प्लेक्स में अपने चैंबर तक पहुंच की अनुमति दी जा सकती है।  इसे संबंधित बार एसोसिएशनों द्वारा सुव्यवस्थित किया जा सकता है और जिला जजों को सामाजिक मानदंडों को निर्धारित करना चाहिए।

14 सामाजिक दूरियों के साथ चलने के लिए परिसर में कॉरिडोर बनाया जाए और किसी भी व्यक्ति को बिना फेस मास्क के प्रवेश न दिया जाए और एंट्री पॉइंट पर हाथों को साफ सेनेटाइज करावाकर प्रवेश कराया जाए।

15. प्रत्येक आवश्यक सूचीबद्ध मामले के लिए निश्चित समय सुनवाई के लिए दिया जाना चाहिए ताकि एक समय में केवल एक ही मामले को सुना जा सके और संवैधानिक अधिकारों के लिए संभावित अपूरणीय चोट के आधार पर मामले की तात्कालिकता का फैसला किया जा सके।  अन्य मामलों को तीन महीने के लिए स्थगित किया जा सकता है।

16. ताजा मामले केवल प्रत्येक अदालत में 10 तक सीमित होंने चाहिए और लंबित जरूरी मामलों को प्रत्येक अदालत में उसी अनुपात में सूचीबद्ध किया जाए।

17. जमानत से संबंधित मामलों में यह सुझाव दिया जाता है कि जब भी मजिस्ट्रेट की अदालत के सामने जमानत के लिए आवेदन दायर किया जाता है, तो स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना आवश्यक होता है। ऐसी स्थिति में रिपोर्ट की सत्यापित प्रति अनिवार्य रूप से याचिकाकर्ता के वकील को दी जानी चाहिए।

18. किसी भी लिटिगैंट को अनावश्यक अदालत परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाए। उन्हें अपने कार्यालयों में और चैम्बर में प्रवेश के लिए अपने वकील को ब्रीफ करना होगा, विशेष तिथि के लिए वकील से क्लाइंट के लिए एक मेल अनिवार्य होना चाहिए।

19. स्टेट बार काउंसिल,बिहार द्वारा संबंधित वकीलों को जारी किए गए पहचान पत्र को कर्फ्यू पास माना जा सकता है और कोई अलग पास अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

20. COVID 19 आपात स्थितियों से निपटने के लिए पूर्ण अवसंरचना के साथ एक एम्बुलेंस COVID परीक्षण किट के साथ सभी न्यायालय परिसर में अनिवार्य होने चाहिए ।

इस देश का लोकतंत्र साक्षी है कि अंग्रेजी पराधीनता से लेकर 2021 के भारत तक अधिवक्ताओं ने अपनी भूमिका और योगदान से राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है। अधिवक्ता समाज सदैव देश के विभिन्न सकारात्मक आंदोलनों का नेतृत्व करता रहा है। परन्तु दुर्भाग्य है कि नेतृत्व की प्रथम पंक्ति के योद्धा अधिवक्ता आज आर्थिक समस्याओं से घिर गए हैं।

आज आवश्यकता है कि कोरोना वैश्विक महामारी के कारण आर्थिक दुष्चक्र में फंसे इस वर्ग को सरकार राहत पहुंचाए। हम दृढ़ता से आशा करते हैं और मानते हैं कि यदि हम सभी एहतियाती उपायों का पालन करते हैं, तो हम स्थिति का मुकाबला करने में सक्षम होंगे और न्यायालयों में सामान्य स्थिति लाने के अपने लक्ष्य में सफल होंगे।

(लेखक नीतीश कुमार सिंह,पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता है. लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के है. व्यक्त विचार से n7india का कोई लेना देना नहीं है.)

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