

हिन्दी भारत की राजभाषा है। भारत की पहली भाषा का सम्मान संस्कृत को मिला है। भारत में साहित्य की परम्परा को देखें तो यह संस्कृत भाषा से ही प्रारम्भ है और अध्यात्म की सीढ़ी चढ़कर ही आगे बढ़ी है। भारत का पहला लिखित ग्रन्थ वेदों को माना जाता है। वेदों की व्याख्या करते हुए स्मृति, ब्राह्मण, पुराण, विभिन्न भाष्य आदि ग्रन्थ सामने आए।

संस्कृत भाषा ने कई स्वरूप धारण किया और इससे निकली हिंदी ने व्यापक रूप ग्रहण किया। हिंदी साहित्य की एक समृद्ध परंपरा प्रारम्भ हुई। इसमें ध्यान देने वाली बात है कि हिंदी साहित्य की यह समृद्ध परंपरा अध्यात्म को समानांतर में लेकर चली। हिंदी साहित्य के एक कालखंड को ही भक्तिकाल का नाम दिया गया है। यह काल हिंदी साहित्य में अध्यात्म की विवेचना है।

हिन्दी साहित्य का आरम्भ देखा जाए तो कुछ विद्वान् चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो) से मानते हैं; तो कुछ शालिभद्र सूरि (भरतेश्वर बाहुबली रास), सरहप्पा (दोहाकोष), गोरखनाथ, स्वयम्भू से।राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी का प्रथम कवि जैन साहित्य के रचयिता सरहपा को माना है जिनका जन्मकाल 8वीं सदी माना जाता है। परन्तु हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी का प्रथम कवि अब्दुर्हमान को माना है। ये मुलतान के निवासी और जाति के जुलाहे थे। इनका समय 1010 ई० है। इनकी कविताएँ अपभ्रंश में हैं। -(संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृष्ठ 431)[1] हिन्दी साहित्य का प्रथम कालखण्ड आदिकाल कहलाता है। इस कालखंड के साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है।
सिद्ध-साहित्य, नाथ-साहित्य एवं रासो साहित्य।
सिद्ध साहित्य सिद्ध उस समय भारतीय अध्यात्म को नई दिशा दे रहे थे। भारतीय आध्यात्मिक दर्शन को जन सुलभ कर रहे थे और जनभाषा में लिख रहे थे। इस साहित्य में वह तंत्र के रहस्य को खोल रहे थे। सिद्धों की संख्या 84 मानी जाती है। ये बौद्ध द्वारा अपनाए गए आध्यात्मिक प्रक्रिया की विवेचना कर रहे थे। तांत्रिक क्रियाओं और मंत्र द्वारा सिद्धि का अभ्यास करने के कारण ही यह ‘सिद्ध’ कहलाये। 84 सिद्धों में सरहपा, शबरपा, कण्हपा, लुइपा, डोम्भिपा, कुक्कुरिपा आदि को विद्वानों ने प्रमुख माना।
सरहपा को न सिर्फ प्रथम सिद्ध की संज्ञा दी गई, बल्कि कई विद्वानों ने इन्हें हिन्दी साहित्य का प्रथम रचयिता भी माना। इनकी रचनाएं विशुद्ध आध्यात्मिक हैं और अध्यात्म की व्याख्या हैं। सिद्ध रचनाएँ दो स्वरूपों में मिलती हैं ‘दोहा कोष’ और ‘चर्यापद’। सिद्ध-साहित्य अपभ्रंश एवं हिन्दी के संधि काल में रची जा रही थीं। इसमें दोनों ही भाषाओं का सम्पुट है। इसलिए इस साहित्य की भाषा को ‘संधा’ या ‘संध्या’ भाषा भी कहा जाता है।
क्रमशः
लेखिका:डॉ. रीता सिंह, विभागाध्यक्ष, बी.एड.विभाग, ए.एन.कॉलेज,पटना (पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय)



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