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आखिर सारा कैश जा किसकी जेब मे रहा है ?

कहा जा रहा है कि हमे इकनॉमी में डिमांड बढ़ाने के लिए और नोट छापने होंगे लेकिन हमने यदि ओर करंसी नोट छापे तो हमे जिम्बावे बनने से कोई रोक नही सकता ! जहाँ लोग सूटकेस भर के नोट ले जाते हैं और थैली भर कर सब्जी खरीदकर लाते थे.

Girish Malviya कहा जा रहा है कि हमे इकनॉमी में डिमांड बढ़ाने के लिए और नोट छापने होंगे लेकिन हमने यदि ओर करंसी नोट छापे तो हमे जिम्बावे बनने से कोई रोक नही सकता ! जहाँ लोग सूटकेस भर के नोट ले जाते हैं और थैली भर कर सब्जी खरीदकर लाते थे. देश के आम आदमी को अब बड़े बड़े करंसी नोट देखने को भी नही मिल रहे हैं लेकिन आश्चर्यजनक रूप से RBI के रिकॉर्ड के अनुसार नकदी यानी करंसी नोट का चलन बेतहाशा बढ़ गया है ! एक दिन यह देश का सबसे बड़ा घोटाला साबित होगा..आपको याद है न !..नोटबन्दी के पहले हर आदमी के जेब मे अच्छा खासा कैश रहता था, वह राजा की तरह बाजार में जाता और झटके से हजारों के मोबाइल खरीद लेता अन्य कोई इलेक्ट्रॉनिक आइटम खरीद लेता।। लेकिन जैसे ही नोटबन्दी हुई लोगो की जेब से कैश गायब होने लगा. नोटबन्दी करने का जो सबसे पहला कारण बताया गया वह था कैश बबल..अनिल बोकिल टाइप के अंधभक्त अनर्थशास्त्रियों ने बताया था भारतीय अर्थव्यवस्था में नगदी यानी करंसी नोट बहुत ज्यादा हैं. सरकार के पिट्ठू बने अर्थशास्त्री यह बता रहे थे कि नोटबन्दी के पहले बड़ी संख्या में करंसी सर्कुलेशन में आ गयी थी जिसे रोका जाना जरूरी था..आप जानते हैं कि 2016 में नोटबंदी के समय देश की अर्थव्यवस्था में नकदी कितनी थी? आरबीआई के मुताबिक, उस वक्त 17.97 लाख करोड़ रुपये नकद रूप से चलन में था यानी करंसी नोटो की शक्ल में !…लेकिन आप हैरान हो जाएंगे जब आज की स्थिति जानेंगे !……

आरबीआई द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार मार्च, 2021 तक भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी का चलन बढ़कर 28.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया हैं. यानी आप खुद सोचिए कि आजादी के 67 सालो में कुल मुद्रा का चलन था लगभग 18 लाख करोड़ रुपये। और मात्र साढ़े तीन साल में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा छाप दी गयी ! सबसे बड़ी बात तो यह कि यह मुद्रा आखिर गयी कहा ? क्योकि नोटबन्दी के पहले तो हमे यह मुद्रा आम आदमी के हाथों में दिखती थी !

2016 को की गई नोटबंदी का बड़ा उद्देश्य नकदी के इस्तेमाल में कमी लाना बताया गया था तो आज अगर कैश इतना अधिक बढ़ा है तो कहा गयी आपकी कैशलेस/ लेसकैश इकनॉमी? नकदी का चलन में बढ़ोतरी पिछले वित्त वर्ष में बेतहाशा रूप से बढ़ी है. यह पिछले साल के मुकाबले 16.8 फीसदी अधिक है। 2010-11 के बाद का सबसे बड़ा उछाल है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बीच लगातार दूसरे महीने डिजिटल लेनदेन में भी गिरावट आई है।

अब बताइये कहा गए ‘कैश बब्बल’ की बात करने वाले अर्थशास्त्री ? अब ऐसी सिचुएशन मे जहाँ आप साढ़े तीन साल में 10 लाख करोड़ के करंसी नोट छापकर बाजार में डाल चुके है तो आप कैसे और नोट छापेंगे ! और जो नोट छापे गए वो आखिर गए कहा? बढ़ती महंगाई बता रही है कि देश जल्द ही उपरोक्त स्थिति वाला जिम्बाब्वे बनने वाला है. सच्चाई यह है कि इस आदमी ने देश को बर्बाद कर दिया है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार है.)

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