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भारत-चीन विवाद अब बातचीत से शायद ही सुलझे, क्योंकि रायता ज़्यादा फैल चुका है..

Deoghar Airport का रन-वे बेहतर: DGCA

By: Hasan Jamal zaidi

भारत चीन विवाद अब बातचीत से तो शायद ही सुलझे! क्योंकि रायता कुछ ज्यादा ही फैल चुका है, और ऐसे मामले बातचीत से सुलझते भी नहीं है ।

लद्दाख के बाद अब अरुणाचल प्रदेश का बोर्डर गरमा रहा है । 

वहां अभी कुछ दिन पहले 5 भारतीय नागरिकों को चाईनीज फोर्स द्वारा पकड़ कर ले जाने की बात सामने आई ।  किरण रिजिजू ने ट्वीट भी किया इस पर, लेकिन चाइना की तरफ से जो जवाब आया है उससे समझा जा सकता है कि अब सिचुएशन दूसरी हो चुकी है ।

चाइना ने कहा है कि वो अरुणाचल प्रदेश को नहीं मानते ये तो नाम ही गलत है। ये साउथ तिब्बत का एरिया है जो तिब्बत का भाग है। इसलिए भारत का इस पर सवाल करने का मतलब नहीं बनता।

देखिए… चीजें एकदम से ऐसे नहीं बदलती

इन सब के पीछे वजह होती है । अपने प्लान ओर स्ट्रेटजी होती है । भारत द्वारा ब्लैक टॉप की हाइट कब्जाने में जिस स्पेशल फ्रंटियर फोर्स SFF का इस्तेमाल हुआ और जिस तरह से न्यूज चैनलों पर इसे बताया गया उससे साफ हो गया था कि तिब्बत कार्ड अब ओपनली प्ले कर दिया गया है ।

SFF निर्वासित तिब्बतियों को लेकर बनाई गई फोर्स है ओर ये आर्मी चीफ के अंडर नहीं आती। ये कैबिनेट सेक्रेट्री और आई बी के अंडर काम करती है। इसे सीआईए का भी सहयोग मिलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसका गठन 1962 युद्ध के समय हुआ था । जैसे मुक्ती वाहिनी 1971 में बनी थी। ये सब बातें अब पब्लिक डोमेन में है । इसलिए मैं भी कुछ सीक्रेट नहीं लिख रहा हूं । 

तिब्बत-भारत-चाइना के बीच एक बफर स्टेट था जिसे 1951 में चाइना ने कब्जा लिया था । वहां के धार्मिक गुरु दलाई लामा अपने सहयोगियों के साथ भारत में शरण ली थी । हम सभी लोग ये बात जानते हैं । 

भारत आज भी तिब्बत को अलग देश मानता है और तिब्बत के प्रेसीडेंट भारत से ही तिब्बत की सरकार चलाते हैं। इसीलिए चाइना के लगभग 3500 किमी के बोर्डर पर लगने वाली फोर्स का नाम भारत तिब्बत सीमा पुलिस ITBP रखा गया ।क्योंकि हम तिब्बत को बोर्डर मानते हैं । 

ये पहले शायद कुछ लोग ही जानते होंगे। मैं भी नहीं जानता था । ये तिब्बत प्रेसीडेंट को तो मैंने भी अभी हाल ही में देखा । "लोपसांग सांगेय " पिक डाली है इनकी। ये तिब्बत के प्रेसीडेंट है। लेकिन रहते भारत में हैं। 

हालांकि पहले भी जब कभी कोई चाइनीज प्रेसीडेंट भारत आते थे तो तिब्बती लोग प्रोटेस्ट करते थे। 

दिल्ली में तो मैंने खुद इन तिब्बतियों को प्रोटेस्ट के दौरान दिल्ली पुलिस से पिटते देखा है। क्योंकि तब चाइना से हमारे रिश्ते सामान्य थे। तो भारत को भी क्या जरुरत थी इन तिब्बत वालों के लिए अपने संबंध खराब करने की ? 

तिब्बत आज़ाद होना चाहिए , किसी को बलपूर्वक इस तरह नहीं कब्जाना चाहिए। देखिए बदमाशी या फौजी ताकत से आप किसी भी एरिया को एक समय तक कब्जाए रख सकते हैं । लेकिन ईश्वर कभी न कभी तो उनकी भी सुनता है , और जब सुनता है तो सारे दांव उल्टे पड़ने लगते हैं । 

असल में सब ज़रुरत का खेल है। इसमें हमें किसी देश में कोई सिद्धांत या आदर्श ढूंढने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अपने निजी जीवन में भी जब हम सामने वाले की ओर एक उंगली दिखाते हैं तो बाकी तीन उंगली हमारी तरफ भी होती है । इसलिए हमें अपने आचरण भी ध्यान रखना चाहिए । 

चाइना यहां लद्दाक की ये फिंगर या पैंगोंग लेक कब्जाने नहीं आया है । ये मैंने पहले भी लिखा था अब भी वही बात है । उसका मूवमेंट तो स्ट्रेटजिकल है। जियो पोलिटिकल के हिसाब से मैप बदल रहे हैं सबकी अपनी-अपनी जरूरतें है। इसलिए अगर जरुरतमंद आपस में भिड़ भी जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।

Disclaimer: ये आलेख मूल रूप से लेखक के फेसबुक वॉल से साभार है. ये लेखक के निजी विचार हैं.

\"नमन

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