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केंद्र से फ्री अनाज फिर भी बिहार के गरीब-मजदूर वंचित क्यों ?

पासवान के आंकड़े नीतीश के खिलाफ चुनावी मुद्दा बन सकते हैं। 


 Written by: एन. के. सिंह   

नई दिल्ली। 

केन्द्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय ने पिछले हफ्ते कुछ आंकडे जारी किया। जिनको देखने से स्पष्ट होता है कि बिहार की सरकार अपने गरीब-मजदूरों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना में मिला मुफ्त पांच किलो प्रति व्यक्ति की दर से राशन भी नहीं बाँट रही है। लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों के कष्ट से उभरा जनाक्रोश केंद्र सरकार को सकते में ला दिया था. तत्काल 14 मई को भारत की वित्त-मंत्री ने सभी गरीब-मजदूरों को बगैर किसी राशनकार्ड के भी पांच किलो प्रति व्यक्ति मुफ्त अनाज देने की घोषणा की.

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने इस योजना को सभी करीब आठ करोड़ मजदूरों को देने की समयावधि नवम्बर तक बढ़ा कर कोरोना संकट में एक कल्याणकारी राज्य की भूमिका का परिचय दिया. लेकिन क्या उद्देश्य सफल हो पाया?

यह फ्री राशन गरीबों को राज्य सरकारों द्वारा बांटा जाना है. जाहिर है यह उदार योजना करोड़ों प्रवासी मजदूरों को जो लॉकडाउन के बाद बेरोजगार हो कर “घर” लौटे थे, लक्षित करके बनाई गयी थी. ध्यान रहे कि जिन तमाम राज्य सरकारों ने, जो पहले इन मजदूरों को “जो जहाँ है वहीँ रहे” का ऐलान कर उन्हें अपने राज्य में लाने से आनाकानी किया था, जनाक्रोश देखते हुए उन्हें वापस बुलाया, फिर बड़े-बड़े वादे किये जैसे …“वे हमारे अपने हैं… अब उन्हें जाने नहीं दिया जाएगा.. उन्हें गाँव के आसपास हीं काम दिया जाएगा… अगर किसी राज्य को हमारे श्रमिकों की जरूरत होगी तो हमसे इजाजत लेनी होगी … बाहर जाने पर इन मजदूरों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य, बेहतर मजदूरी और आवासीय व्यवस्था की जायेगी”.

लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि 26 राज्यों व् केंद्र-शासित प्रदेशों ने अपने-अपने कोटे का फ्री अनाज तो उठा लिया लेकिन दो माह बाद भी केवल 13 फीसदी अनाज हीं बांटा?

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ बेहद गरीब राज्यों ने, जहां  से सबसे अधिक प्रवासी मजदूर देश भर में जाते हैं, मई माह में केवल दो फीसदी और जून में 2.25 फीसदी अनाज हीं मजदूरों को मयस्सर कराया. बिहार ने तो मई माह में 2.13 फीसदी बांटा लेकिन जून में एक दाना भी अनाज किसी मजदूर को नहीं दिया.

केन्द्रीय मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़े बिहार सरकार की आपराधिक अकर्मण्यता की पोल खोलते हैं. इस नीतीश सरकार ने फ्री राशन का अपना कुल 86,450 मेट्रिक टन का कुल कोटा तो केंद्र से उठा लिया था. लेकिन बांटा नहीं. कुछ हफ्ते पहले तक ही, यही राज्य सरकार केन्द्रीय खाद्य मंत्री राम बिलास पासवान की आलोचना करती रही थी कि बिहार में बढी आबादी के लिए सस्ता राशन उपलब्ध नहीं हो रहा है जबकि पासवान का कहना था कि राशन कार्ड में उनका नाम नहीं है. आज जब राशन कार्ड की अपरिहार्यता हीं ख़त्म है और मुफ्त राशन का कोटा भी राज्य सरकार ने उठा लिया है तो गरीब प्रवासी मजदूरों तक उनका न पहुँचना बिहार की वर्तमान सरकार को चुनाव में महंगा पड सकता है. पासवान के मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ा चुनाव का मुद्दा हो सकता है खासकर तब जब सीटों के बंटवारे को लेकर पासवान और नीतीश में “शीतयुद्ध “ जारी है.  पासवान बिहार से दलित नेता हैं और सम्बंधित मंत्रालय के मंत्री भी।  मीडिया से बात करते हुए 2 जून को पासवान ने राज्य सरकारों द्वारा अनाज न बांटना “गंभीर चिंता” का विषय बताया है. 

उधर पटना हाई कोर्ट ने भी बिहार की सरकार से पूछा है कि क्यों मकई की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद नहीं की गयी. कहना न होगा कि बिहार और उत्तर प्रदेश दो ऐसे राज्य हैं जिन्होंने आपराधिक निष्क्रियता दिखाते हुए इस बार मक्का सहित गेंहूं आदि  की सरकारी खरीद लक्ष्य से बेहद कम की है. नतीजतन किसानों को आढतियों को अनाज आधे दामों पर बेंचना पडा है.    

कुल 11 राज्य ऐसे रहे जिनकी सरकारों ने अपने कोटे के कुल अनाज का मात्र एक फीसदी हीं बांटा. ध्यान रहे कि इन राज्य सरकारों को यह अनाज केंद्र से मुफ्त में मिला था और इनका काम बगैर किसी राशन कार्ड अदि की औपचारिकता किये मजदूरों को पांच किलो प्रति व्यक्ति की दर से बांट देना था.

केन्द्रीय मंत्रालय के आंकडे यह भी बताते हैं कि कुछ राज्य सरकारों जैसे राजस्थान (95 फीसदी) , हरियाणा (52 फीसदी) बाँट कर मजदूरों को बड़ी राहत दी है जबकि हिमाचल प्रदेश , कर्नाटका और असम की सरकारों ने भी इस मामले में सराहनीय कार्य किया है. जिन राज्यों ने फ्री राशन नहीं बांटा ये वही राज्य हैं जहां किसानों के अनाज की सरकारी खरीद में भी कोताही की रिपोर्टें मिल रही हैं. याने अकर्मण्यता हर आयाम पर है. राजनीति-शास्त्र में पढ़ाया जाता है कि प्रजातंत्र में जनमत का दबाव इतना होता है कि राज्य का कल्याणकारी भूमिका में आना मजबूरी होती है. पर शायद बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारें मुतमईन हैं कि इन राज्यों का मतदाता अपने कल्याण से ज्यादा मंदिर-मस्जिद, जात-पात और संकीर्ण अवधारणाओं के आधार पर वोट देता है। 

लेखक एन. के. सिंह देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं. 

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