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बिहार में तमाम कोशिशों के बावजूद शराब के अवैध धंधे पर रोक नहीं

बिहार में दो अक्टूबर-2016 से शराबबंदी कानून लागू है, लेकिन इसके बावजूद भी प्रदेश में बड़े पैमाने पर शराब की खरीद-बिक्री अवैध रूप से जारी है।

Patna: बिहार में दो अक्टूबर-2016 से शराबबंदी कानून लागू है, लेकिन इसके बावजूद भी प्रदेश में बड़े पैमाने पर शराब की खरीद-बिक्री अवैध रूप से जारी है। इस कारोबार में छोटे-छोटे स्कूली बच्चे सहित बड़े पैमाने पर बेरोजगारों की एक पूरी फौज लिप्त है। बीते छह साल के दौरान जहां अवैध शराब के कारोबार से बिहार को 18-20 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का घाटा लग चुका है, वहीं प्रशासन और सरकार के लाख प्रयास के बावजूद इस पर अंकुश नहीं लग पाया है।

क्या कहते हैं गोपालगंज के पुलिस कप्तान

उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे गोपालगंज जिले के पुलिस कप्तान का कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर प्रशासन के पास वाहन चेकिंग करने का मैन्युअल तरीका है। बिहार में सबसे ज्यादा शराब अवैध रूप से इसी मार्ग से पहुंच रही है। हमारे पास स्कैनर या ड्रोन से मॉनिटरिंग करने का तरीका नहीं है। इस वजह से हमें यह पता नहीं चल पाता है कि ट्रक के अंदर क्या है। हर दिन हजारों वाहन सीमाओं से गुजरते हैं, और हम केवल कुछ को मैन्युअल रूप से जांच सकते हैं। डिलीवरी से एक दिन पहले, पार्टी को ड्रॉप लोकेशन के बारे में सूचित किया जाता है और माफिया को बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाता है। ट्रस्ट बनने के बाद डिलीवरी वाले दिन भुगतान भी स्वीकार किया जाता है। छोटी खेप आमतौर पर एसयूवी और पिकअप वैन में ले जाई जाती है और आमतौर पर बाइकर्स द्वारा एस्कॉर्ट किया जाता है, जो किसी भी संभावित चेकअप के दौरान मुख्य वाहन को सचेत करते हैं। यदि किसी वाहन को उसके गंतव्य तक पहुंचने से पहले रोका जाता है, तो जब्त किए गए वाहन की लागत, वैध शिपमेंट (गोभी, फूलगोभी आदि) और शराब पार्टी द्वारा वहन की जाती है। इस कारण से, पुराने वाहनों और बिना दस्तावेजों के वाहन आमतौर पर डिलीवरी के लिए उपयोग किए जाते हैं।

बिहार में तीन प्रकार की श्रेणियों में मिलती है शराब

प्रदेश में शराब की तीन व्यापक श्रेणियां हैं। स्प्रिट के इस्तेमाल से बनने वाली दमाल या नकली शराब की बाजार में 50 फीसदी हिस्सेदारी है। अंग्रेजी (भारतीय निर्मित विदेशी शराब) या ब्रांडेड माल की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है, जबकि देसी/चुलाई में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। अमीर लोग ब्रांडेड शराब का सेवन करते हैं, चुलाई शराब पीने वाले लोग की संख्या सबसे कम है।

शराब का सेवन करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि शराबबंदी लागू होने के बाद से वह शराब के लिए एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) से लगभग दोगुना भुगतान कर रहे हैं। उनका कहना है कि हमें पीने की आदत है। चाहे उसके लिए प्रीमियम कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। वे कहते हैं, ”चाहे कीमत जो भी हो, जो पीना चाहते हैं वो पीएंगे।

लोगों ने बताया कि कस्बों और शहरों में स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र और बेरोजगार शराब की अंतिम आपूर्ति के लिए डिलीवरी बॉय के रूप में काम करते हैं। कस्बों और शहरों में, स्कूली बच्चे और कॉलेज के छात्र बाइक या स्कूटर के साथ डिलीवरी बॉय के रूप में काम करते हैं।

शराब के अवैध कारोबार में लिप्त एक बिचौलिए ने बताया कि अधिकारियों के साथ हमेशा के लिए एक छोटी सी बात होती है।” पिकअप, बिक्री और यहां तक कि एक छोटी खेप को पकड़ने के लिए सौदे किए जाते हैं, जबकि एक बड़ी खेप को आसानी से उस थाना क्षेत्र से गुजार दिया जाता है। कुछ लोगों ने बताया कि जब अधिकारियों द्वारा अवैध शराब की खेप पकड़ी जाती है, तब भी यह प्रमाणित करने या ऑडिट करने वाला कोई नहीं होता है कि वास्तव में क्या जब्त किया गया है। “केवल 30-40 प्रतिशत ही जब्त सामग्री (शराब) के बारे में घोषणा की जाती है। तस्वीरें ली जाती हैं और उन बोतलों के कुचले जाने के वीडियो बनाए जाते हैं लेकिन 60-70 प्रतिशत माल बड़े स्टॉकिस्ट के पास पहुंच जाता है।

पटना पुलिस मुख्यालय में पदस्थापित एक अधिकारी ने बताया कि न्यायपालिका और पुलिस पर शराब के मामलों का भारी बोझ है। यहां तक कि विशेष वकील भी हैं। उनके पास भी शराब मामलों के केस की भरमार है। इसलिए जमानत मिलने में भी परेशानी होती है और केस का अंबार सा बन गया है।

शराबबंदी के बाद से अब तक हजारों चार्जशीट दाखिल हो चुकी हैं, लेकिन सजा की दर कम है

चार्जशीट ———— आरोप तय

  • पटना- 40,157 ——– 06
  • कटिहार- 11,371 —– 19
  • नालंदा- 10,093 —– 20
  • पूर्णिया- 8,348 —— 07
  • नवादा- 7,441 —— 11
  • समस्तीपु- 6,748 —- 84
  • मधेपुरा- 4,896 —— 14
  • सीतामढ़ी- 4,620 —- 10
राज्य के राजस्व को कितना हुआ आर्थिक नुकसान

बिहार के शराबबंदी और उत्पाद शुल्क विभाग के आंकड़े भारी राजस्व नुकसान की ओर इशारा करते हैं।आरटीआई द्वारा मद्य निषेध विभाग (बिहार) से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 2015-16 में जहां विभाग को 3,150 करोड़ रुपये का आय प्राप्त होता था, वह 2017-18 में घटकर 4.91 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। अगर 2015-16 के आय का ही छह गुणा कर दिया जाए तो यह 20 हजार करोड़ के पास बैठता है। (HS)

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