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योग को संपूर्णता में धारण करें….

योग, भक्ति, मन्त्र-अनुष्ठान, यज्ञ, पूजा-पाठ प्रक्रिया अभी अध्यात्म के विभिन्न सोपान हैं। यह सभी अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों तक पहुंचने की प्रक्रिया है।

Written By: डॉ रीता सिंह

हम सीधे योग पर विचार करें। योग के दो पक्ष है: – व्यवहारिक और आध्यात्मिक। व्यवहारिक पक्ष से हम निरोगी शरीर की तैयारी करते हैं ताकि आध्यात्मिक शरीर में हमारा प्रवेश संभव हो सके। जब योग के आध्यात्मिक पक्ष को हम धारण कर लेते हैं तो भौतिक शरीर से ऊपर उठकर उच्चतम ब्रह्मांडीय ऊर्जा से मिलन की ओर चल पड़ते हैं। 

योग, भक्ति, मन्त्र-अनुष्ठान, यज्ञ, पूजा-पाठ प्रक्रिया अभी अध्यात्म के विभिन्न सोपान हैं। यह सभी अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों तक पहुंचने की प्रक्रिया है। हम प्रायः धार्मिक होने को पूजा पाठ, कर्मकांड, मूर्ति पूजा, जप तप उपवास आदि से जोड़कर देखते हैं। इसी संदर्भ में कई लोग खुद को नास्तिक भी कहते हैं। योग को भी इसी परिभाषा में बैठकर उससे दूर जाते हैं या इसे व्यायाम तक सीमित कर देते हैं। योग से पहले धर्म को समझें। अध्यात्म की पहली सीढ़ी धर्म है, दूसरी योग है, तीसरी विश्वास है, ऐसे ही अनेक सोपान से गुजरते हुए हम अध्यात्म की चरम पर पहुंचते हैं।

धर्म का अर्थ है धारण करना। सद्गुणों को धारण करना धर्म है। धर्म को धारण करने की प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों में योग, भक्ति, स्वध्याय आदि हैं। धर्म धारण का उच्चतम पड़ाव अध्यात्म है। धर्म के नाम पर होने वाले कर्मकांड हमें योगी होने से, आध्यात्मिक होने से रोकते हैं। इसीलिए सरहपा, कबीर, रहीम  सभी ने धर्म के नाम पर होने वाले कर्मकांड का विरोध किया था। 

कबीर कहते हैं न मैं जप में, न मैं तप में, न काबे कैलाश में, कहे कबीर सुनो भी साधो, मैं तो हूँ विश्वास में। मीरा भी सिर्फ कृष्ण के मूर्ति की पूजा नही करती थी, वह कहती हैं- पायो जी मैंने नाम रत्न धन पायो। योग आपके भीतर क्या करता है?धीरे धीरे आपको बदलता है। स्वयं की इंद्रियों पर नियंत्रण करवाता है। स्वयं का शोधन करवाता है। विचारों के साथ शुद्ध आचरण को प्रेरित करता है और अंततः प्रकृति के कण-कण से प्रेम की डोर में बांधता है।

शर्तविहीन प्रेम ही अध्यात्म है। (Unconditional love) जब हम गुणों को धारण करते हैं तो धार्मिक होते हैं, धार्मिक होते हैं तो प्रेम पनपता है, यह प्रेम भक्ति और समर्पण है। हमारा विश्वास दृढ़ होता है, हम प्रेम से जुड़ते हैं, यह जुड़ना ही प्रेम है। प्रेम की राह पर चल पड़ना ही योग है, अध्यात्म है।

प्रेम की राह पर चलने वाला हर व्यक्ति धार्मिक है, भक्ति से भरा है, आध्यात्मिक है और योगी है। आइए हम योग को संपूर्णता में धारण करें। 

(लेखिका: डॉ रीता सिंह, न्यास योग ग्रैंड मास्टर सह विभागाध्यक्ष, बी.एड विभाग, ए. एन. कॉलेज, पटना।)

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