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निजीकरण एवं महंगाई को बढ़ावा देने वाला आम बजट

N7News Admin 21-02-2021 07:05 PM Opinion

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By: प्रो. (डाक्टर) नागेश्वर शर्मा

Opinion

कोरोना महामारी से बुरी तरह से प्रभावित भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में आज का आम बजट प्रभावी होगा, इसमे संदेह है। चालू वित्त वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में विकास की संभावित दर 2021 -22 में 11% होने का अनुमान किया गया है। साथ ही,अगले वित्त वर्ष में विकास के v shaped होने की बात कही गई थी। लेकिन, बजट में ऐसी कोई योजना नही है, जिससे लकवाग्रस्त ग्रस्त अर्थव्यवस्था को तत्काल संजीवनी मिल सके।

बजट के समय बजट फीवर /फ्लू आता है...

यह मायने नही रखता कि विकास U, W या K शेप्ड है, मायने इस बात का है कि विकास कितनी मात्रा में, कितनी जल्दी होता है। अभी छह स्तंभों वाले बजट पर गर्मागर्म बहस जारी है,एक माह बाद किसी को बजट से कोई लेना-देना नही रहेगा। सिवाय संबंधित मंत्रालय के किसी को याद भी नही रहेगा कि कितनी राशि आवंटित की गई है। अगर सब कुछ बजट के अनुसार होता तो देश कबका विकसित देश की श्रेणी में आ गया होता, और गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी दूर हो गई होती। मेरा ऐसा मानना है... बजट के समय बजट फीवर /फ्लू आता है, और एक फगवाड़ा में दूर हो जाता है ।

आम बजट की मुख्य बातें समीक्षा के साथ :-

बजटीय इतिहास में पहली बार पेपरलेस बजट प्रस्तुत किया गया, और छह स्तंभों में बांट कर बजट को नये स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। पहले स्तंभ का शीर्षक है -"कल्याण और स्वास्थ्य "। कोविड-19 ने 'जान है तो जहान है ' लोकोक्ति के महत्व को समझा दिया है। कोविड के बाद यह पहला बजट है। कोविड 19 के दौरान चिकित्सकीय हालात की जिस बुरी दशा -दिशा से पूरे देश को गुजरना पड़ा , उसके मद्देनजर स्वास्थ्य व्यवस्था पर जोर देना लाजिमी था, और सराहनीय भी है। यही वजह है कि बजट में आवंटित राशि पिछले बजट में आवंटित राशी की तुलना में 137 % ज्यादा है और कुल राशि 2,23,846 करोड़ है। जबकि पिछले बजट में आवंटन मात्र 94 लाख करोड़ ही था। स्वास्थ्य पर जी डी पी का मात्र 1 % ही खर्च किया जाता था। कम से कम जी डी पी का 3% स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए। अतः यह पहल एक कल्याणकारी पहल है ।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अल्फ्रेड मार्शल का कहना था कि "wealth is not an end, the end is human welfare ".

लेकिन 170 %की वृद्धि में 60,030 करोड़ का व्यय पेयजल एवं सैनिटेशन पर, जो कि अलग मंत्रालय के द्वारा डील किया जाता है। स्वास्थ्य मंत्रालय, जैसा कि अनुमान है मात्र 71,269 करोड़ ही वित्तीय वर्ष 2021 -22 में खर्च कर पायेंगे, जो कि पिछले बजट की तुलना में मोटा मोटी 9% ज्यादा होगा । (दी हिन्दू, 2,फरवरी 2021 )

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अब बजट के दूसरे स्तंभ की मुख्य बातों पर गौर करें:-

इसमे भौतिक एवं वित्तीय पूंजी विकास एवं अवसंरचना पर फोकस डाला गया है। बजट में स्पष्ट रूप से रोडवेज, रेलवे, मेट्रोरेल, बंदरगाह का विकास, सूक्ष्म सिंचाई परियोजना और सबसे ज्यादा जरूरी गैस कनेक्शन के लिए वितरण अवसंरचना को मजबूत बनाने पर जोर डाला गया है। लेकिन इसमें भी पूर्ण तटस्थता नही दिखती है। अवसंरचना के विकास बिना देश की प्रगति की रफ्तार तेज नहीं हो सकती है। लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास अगर आवश्यकता के आधार पर न हो तो वह मनोवांछित परिणाम देने वाला नही होगा। तीन राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, एवं असम में चुनाव होने वाले हैं। तमिलनाडु को 3600 किलोमीटर राजमार्ग बनाने के लिए 65 हजार करोड़ रुपए आवंटित करने की घोषणा हुई है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में 675 किलोमीटर नई सड़कें बनेंगी। ऐसी ही घोषणा असम के लिए भी की गई है, झारखंड जो अवसंरचना की दृष्टी से पिछड़ा है, वहां ऐसी घोषणा क्यों नही? इस तरह की घोषणा में चुनावी बू आती है और इससे तो राज्यों के बीच असमानता ही बढेगी।

वित्त वर्ष 2020 -21 के लिए कुल व्यय 34.50 लाख करोड़ था। क्या यह राशि एक साल में खर्च हो पाई? इस बजट में प्रस्तावित खर्च 34 .83 लाख करोड़ है । पर इतना धन कहां से आएगा? अतः सभी खर्च दीर्घकालिक है।

निजीकरण को गति देने वाला बजट :

'Privatisation means F D I  (Foreign Direct Investment ).बड़े पैमाने पर निजीकरण हमेशा बड़ी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करता है। बजट में स्पष्ट घोषणा की गई है कि दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण किया जायेगा। बीमा में अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मात्रा को 74% तक करने की घोषणा की गई है ।सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के विनिवेश की बजट में घोषणा की गई है। दक्षिण पूर्व एशिया और पूरबी यूरोप में बैंक के निजीकरण का मतलब है घरेलु अर्थव्यवस्था में विदेशी उपस्थित में अत्यधिक वृद्धि का होना। दो सरकारी बैंकों के अलावे एक बीमा कंपनी का भी निजीकरण होगा। एयर इंडिया, बी पी सी एल एवं शिपिंग कार्पोरेशन समेत कई अन्य का भी 2022 तक विनिवेश होगा। बजट के घोषणा के अनुसार रणनीतिक क्षेत्र में सरकारी कम्पनियों की मौजूदगी नाममात्र रह जायेगी। गैर -रणनीतिक क्षेत्रों में PSUs का या तो निजीकरण कर दिया जाएगा, या बंद कर दिया जाएगा। भारत में पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड, कंटेनर कार्पोरेशन आफ इंडिया, आइ डी बी आइ बैंक ,BEML, पवनहंस,नीलाअंचल इस्पात निगम लिमिटेड की बिक्री को 2021 -22 में पूरा करने का वादा किया गया है। सरकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी बीमा कम्पनी LIC का आईपीओ लांच किया जाएगा । सरकार को चालू वित्त वर्ष में सरकारी फर्मों के विनिवेश से 1 .75 लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य है ।

बजट में आत्मनिर्भर भारत एवं आकांक्षी भारत की बातें प्रमुखता से की गई है । अच्छी बातें हैं । आकांक्षी भारत बजट का एक स्तंभ ही है । भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की एक महत्वपूर्ण योजना है। हमें पूंजी जुटाने के लिए सरकारी सम्पत्ति बेचनी पड़ रही है। ऐसी हालत में निजीकरण एवं एफडीआई में वृद्धि के साथ आत्मनिर्भर एवं आकांक्षी भारत को सरकार reconcile कर पायेगी?  

बजट मंहगाई एवं बेरोजगारी बढ़ाने वाला :

बजट पूर्व आर्थिक सलाहकारों एवं विशेषज्ञों की सलाह थी कि लाकडाउन से बुरी तरह से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक बड़े बूस्ट अप /बिग पुस की नितांत आवश्यकता है । अत:वित्तीय घाटे की परवाह किए बिना बजट में ऐसी व्यवस्था की जाए कि चरमराई हुई अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर तेज रफ्तार से दौड़ने लगे । इसके लिए तो वित्तीय घाटे के नार्म को तोड़ना ही पड़ता । हुआ भी ठीक ऐसा ही । वित्तीय घाटा की आदर्श सीमा सकल घरेलू उत्पाद का 3%होना चाहिए, ऐसी धारणा चली आ रही है । इसे रूढीवादिता मानते हुए इस वित्तीय बजट मे इसे तोडा गया, और यह सकल घरेलू उत्पाद का 9. 5 % होगा। सरकार का यह कदम इस बात की पुष्टि करता है कि खर्च करो, कल तो होता ही नही है । इस वित्तीय वर्ष यानी 2021-22 वित्तीय घाटा जीडीपी का 9 .5 %होगा । वित्तीय वर्ष 22-23 घटकर यह जीडीपी का 6 .8 %रहेगा ।वित्तीय वर्ष 25 -26 तक यह घटकर 4 .5 %तक आयेगा ।

घाटे की वित्तीय व्यवस्था में व्यय प्राप्त आय से अधिक होता है। इस घाटे को या तो अतिरिक्त मुद्रा निर्गमन के द्वारा या कर्ज लेकर या करारोपण या तीनों स्रोतों के माध्यम से पूरा किया जाता है ।इससे प्राप्त राशि को सार्वजनिक व्यय में लगाया जायेगा, तो इससे लोगों के हाथों में रूपए  आएगा और बाजार में मांग में वृद्धि होगी और सनद रहे कि यह वृद्धि तेजी से होती है, जबकि आपूर्ति में वृद्धि की दर धीमी और विलम्ब से होती है । इस तरह स्पष्ट है कि बजट में Large Fiscal Deficit स्फीति को अधिक तीव्र गति देने में ईंधन  ( fuel ) का काम करेगा ।

आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर टी टी राम मोहन ने लार्ज फिस्कल डिफिसिट को key concern माना है ,  और स्पष्ट किया है कि लार्ज फिस्कल डिफिसिट आर बीआइ को अपने इन्फ्लेशन के 4 %के सेट टार्गेट में परिवर्तन करना पर सकता है ।परिणाम स्फितिक दबाव हो सकता है, लेकिन बजट में यह कदम फिस्कल आरथोडोक्स को गुडबाय कहने के साथ वाशिंग्टन concensus को अपनाने की ओर पैनडेमिक काल में एक बोल्ड कदम है ।

बजट में निजीकरण पर जोर, पीसीयू में भारी विनिवेश आदि बेरोजगारी की दर में वृद्धि लायेंगे । अभी फिलहाल गैर -सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी की दर 17 %है। निजी उद्यमी हमेशा अधिक मुनाफा कमाने हेतु अधिक वेतन पर कम से कम नौकरी प्रदान करते हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग आवश्यकतानुसार नौकरी के अवसर सृजित करते हैं, और वेलफैयर स्टेट की भूमिका निभाते हैं । बजट में 'मनरेगा 'के लिए आवंटित राशि 73000 करोड़ है, जो पिछले बजट में आवंटित राशि से अधिक है, पर रिवाइज्ड आकलन से कम है। मनरेगा रूरल इण्डिया का लाईफ लाइन है, यह कोविड पैनडेमिक काल में साबित हो चुका है । लेकिन 'मनरेगा 'वित्त मंत्री के बजट भाषण से दूर रहा ।जहां तक 'एम एस एम ई 'की बात है, वे अभी तक लाकडाउन की मार से उबर नही पाया है। इसलिए उससे रोजगार के नए अवसर की उम्मीद करना सार्थक नही है। रोजगार पर मुकम्मल फोकस न करना इस आम बजट की एक कमी है।

बजट की कुछ अन्य बातें :-

इस बार के बजट में आयकर दाताओं को कोई राहत नही दी गई। करदाताओं का बड़ा हिस्सा वेतनभोगी कर्मचारी हैं, जो मंहगाई के थपेड़े की चोट से परेशान हैं। कृषि सेस को लेकर भी बजट की आलोचना हुई । आत्मनिर्भर भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो सुरक्षा खर्च में मात्र 1.48 %की वृद्धि नाकाफी है।

फिर भी, वित्त मंत्री ने अपने बजट को Recovery Vehicle बताई हैं, तो कुछ आर्थिक जानकारों ने इसे 'Disappointing 'बताया है । कुछ ने इस बजट को 'Normal budget for abnormal times 'बताया है । किसी ने इस बजट को कमियों के साथ एक बोल्ड कदम और चरमराई अर्थव्यवस्था के लिए 'बूस्टर 'बताया है ।

अब आगामी वर्ष ही बताएगा, तब तक चर्चा -परिचर्चा का दौर जारी रहेगा ।

Disclaimer: लेखक- डॉक्टर नागेश्वर शर्मा , संयुक्त सचिव, भारतीय आर्थिक परिषद्  (बिहार -झारखंड) .ये लेखक के निजी विचार हैं.  

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