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रामप्रसाद बिस्मिल: जिन्होंने क्रांति के लिए हथियार खुद लिखी किताब से मिले रुपयों से ख़रीदे

N7News Admin 11-06-2020 11:47 AM विशेष ख़बर

रामप्रसाद बिस्मिल की तस्वीर।




नई दिल्ली।

भारत माता के वीर सपूत और महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर जिले के मोहल्ला खिरनीबाग में हुआ था. मूल रूप से इनके पूर्वज ग्वालियर के चंबल नदी किनारे तोमरघार गांव के निवासी थे. वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी थे. हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी भाषा का उन्हें अच्छा ज्ञान था. उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा. गुलामी की बेड़ियां तोड़ी और आजादी से मोहब्बत की. ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी. नवयुवकों का नेतृत्व करने वाले पं. रामप्रसाद बिस्मिल कई प्रतिभाओं के धनी थे. राष्ट्रप्रेम की कविताओं के साथ-साथ शायरी भी करते थे. बिस्मिल के क्रांतिकारी विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक अलग ही दिशा दी. 

आखिरी वक्त में लिखी आत्मकथा

पूरा देश उन्हें बड़ी शिद्दत से याद करता है। वहीं गोरखपुर के लिए बिस्मिल एक अलग पहचान हैं। अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन उन्होंने यहां की जिला जेल में बिताए थे। यह वक्त उनके आध्यात्मिक सफर का भी अंतिम पड़ाव था। फांसी के तीन दिन पहले ही उन्होंने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय पूरा किया था। बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। 19 दिसंबर 1927 की सुबह 6:30 बजे गोरखपुर जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और मंत्र पढ़ते हुए फंदे पर झूल गए।

जेल में रहकर लिखीं रचनाएँ

उनके जानने वाले बताते हैं कि अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल उनकी साधना का केंद्र बन गई थी। 30 साल के जीवनकाल में उनकी कुल 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें ज्यादातर अंग्रेजों ने नष्ट करा दीं। गोरखपुर जेल में रहकर उन्होंने बहुत सारी रचनाएं भी लिखीं लेकिन उसे भी जेल प्रशासकों ने जलवा दिया। बिस्मिल अंग्रेजों की इस करतूत से वाकिफ थे, तभी तो उन्होंने फांसी के पहले उनकी आत्मकथा किसी मिलने आए करीबी के हाथ बाहर भिजवा दी थी।

शस्त्र के लिए किया था काकोरी कांड

चौरी-चौरा कांड के बाद अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। इसके कारण देश में फैली निराशा को देखकर उनका कांग्रेस के आजादी के अहिंसक प्रयत्नों से मोहभंग हो गया। फिर तो नवयुवकों की क्रांतिकारी पार्टी का अपना सपना साकार करने के क्रम में बिस्मिल ने चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ गोरों के सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर आरंभ किया लेकिन सवाल था कि इस प्रतिरोध के लिए शस्त्र खरीदने को धन कहां से आये? इसी का जवाब देते हुए उन्होंने नौ अगस्त, 1925 को अपने साथियों के साथ एक ऑपरेशन में काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लूटा तो थोड़े ही दिनों बाद 26 सितंबर, 1925 को पकड़ लिए गए और लखनऊ की सेंट्रल जेल की 11 नंबर की बैरक में रखे गए। मुकदमे के नाटक के बाद अशफाक उल्लाह खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रौशन सिंह के साथ उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई।

खुद लिखी किताब से मिली रकम से खरीदा पहला तमंचा

बिस्मिल बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कुल 11 पुस्तकें लिखी थीं। वे इन पुस्तकों को स्टॉल लगाकर खुद भी बेचते थे। उनकी पुस्तकों में स्वाधीनता का अंश होता था। यही कारण है कि उनकी पुस्तकों को लोग ज्यादा पसंद करते थे। बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने क्रांतिकारी बनने के बाद पहला तमंचा अपनी किताब की बिक्री से मिली राशि से ही खरीदा था। बिस्मिल के जीवन को नई पीढ़ी तक ले जाने की कोशिशों में जुटे गुरुकृपा संस्थान के बृजेश त्रिपाठी कहते हैं, बिस्मिल एक रचनाकार, कवि और साहित्यकार भी थे। वे अपने जीवन में गुरु भाई परमानंद और दादी मां के स्वाभिमान से बहुत प्रेरित थे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है। बृजेश कहते हैं, उनकी भावनाओं में देशभक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वे बहुत पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन साहित्य के मर्मज्ञ थे।

मौत के डर से नहीं मां, तुमसे बिछड़ने के शोक में आए हैं आंसू

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की माता मूलरानी ऐसी वीरमाता थीं जिनसे वे हमेशा प्रेरणा लेते थे। शहादत से पहले ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर वे जेल पहुंचीं तो पंडित बिस्मिल की डबडबाई आंखें देखकर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। कलेजे पर पत्थर रख लिया और उलाहना देती हुई बोलीं, ‘अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है। मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है। उनसे पूछने लगीं, ‘तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था।’ इतिहासकार बताते हैं कि इसके बाद ‘बिस्मिल’ ने बरबस अपनी आंखें पोंछ डालीं और कहा था कि उनके आंसू मौत के डर से नहीं, उन जैसी बहादुर मां से बिछड़ने के शोक में बरबस निकल आए थे।

एकादशी के दिन जन्म और इसी दिन बलिदान

बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी। 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर की जेल में पं. रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई. उन्होंने मात्र 30 साल की आयु में अपने प्राणों को न्यौछावर करके भारत को आजाद करवाने का गजब का जज्बा कायम किया.

भारत के इन बेमिसाल देशभक्तों की शहादत देकर भारत की आजादी के द्वार खोले. पूरा भारत अपने इन वीरों को शत-शत नमन करता है।





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