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यकीनन..दृष्टि नहीं दृष्टिकोण की है ज़रूरत, कुछ ऐसी ही है बोकारो डीसी के हौंसले की कहानी…


बोकारो ।

बोकारो के नए डीसी राजेश कुमार सिंह दृष्टिबाधित हैं और लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में सफलता प्राप्त की है। जिनके लिए अदालत ने भी यह टिप्पणी की थी कि IAS के लिए दृष्टि नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की जरूरत होती है। आईये जानते हैं राजेश कुमार सिंह के बारे में।

झारखंड में पहले दृष्टिबाधित IAS बने बोकारो के डीसी

देश के पहले दृष्टिबाधित आईएएस अधिकारी राजेश सिंह को झारखंड के बोकारो की जिम्मेदारी दी गयी है. राजेश सिंह ने 32वें डीसी के रूप में बोकारो में पदभार ग्रहण किया है. डीसी राजेश कुमार सिंह का कहना है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और मुख्य सचिव सुखदेव सिंह ने पहली बार किसी दृष्टिबाधित अधिकारी को जिले की कमान सौंपी है। मैं मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव का आभार प्रकट करते हुए उन्हें यह विश्वास दिलाता हूं कि मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा। बोकारो जिले के विकास में मैं कोई कसर नहीं छोडूंगा. 

बिहार के रहने वाले हैं राजेश कुमार सिंह

राजेश कुमार सिंह पटना के धनरूआ के गोविंदपुर गांव के रहने वाले हैं। यह गांव विशेष तौर पर लड्डुओं के लिए विख्यात है। उनके दो भाई और एक बहन हैं। पिता सिविल कोर्ट में काम करते थे।

क्रिकेट खेलते हुए चली गई आंखों की रौशनी

राजेश सिंह को बचपन में ही क्रिकेट खेलने का शौक था। बचपन में राजेश सिंह को क्रिकेट खेलने के दौरान चोट लग गयी, जिससे तीसरी कक्षा में ही उनकी दृष्टि बाधित हो गई थी। आंखों की रौशनी चले जाने के बाद उनका एडमिशन देहरादून मॉडल स्कूल में कराया गया। उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय तथा जेएनयू से पढ़ाई की । इसके बाद उन्होंने कभी पीछे नहीं देखा। और वर्ष 2007 में यूपीएससी की परीक्षा पास कर देश के पहले दृष्टिबाधित आईएएस बने।

2007 में पास की थी UPSC परीक्षा,नियुक्ति के लिए लड़नी पड़ी कानूनी लड़ाई

राजेश सिंह ने साल 2007 में यूपीएससी की परीक्षा पास की। लेकिन उनकी नियुक्ति लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2011 में हो पाई। उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। जहां उनके हक में फैसला आया। कारण यह था कि उस वक्त कि सरकार आईएएस बनने के बाद इनके दृष्टि को आधार बनाकर नियुक्ति देने को तैयार नहीं थी । सुप्रीम कोर्ट में उनके मामले की सुनवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर और अभिजीत पटनायक की बेंच ने की। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार कोर्ट ने सरकार को राजेश सिंह की नियुक्ति करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि IAS के लिए दृष्टि नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की जरूरत होती है। राजेश सिंह के इसी दृष्टिकोण ने आज उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। साल 2013 में उनकी शादी हुई।  

हौसले बुलंद हो तो दृष्टिविहीन होना अभिशाप नहीं बल्कि वरदान है:राजेश

पदभार लेने के बाद डीसी राजेश कुमार सिंह ने कहा कि अगर आपके हौसले मजबूत हैं तथा लक्ष्य निर्धारित है तो दृष्टिबाधित होना कोई अभिशाप नहीं है। भारत में डायवर्सिटी की एक अलग पहचान है। असमानता के बावजूद भी जो इस कसौटी पर बेहतर तरीके से मुकाम हासिल करते हैं, वह विशेष कहलाते हैं। मुझे मेरी दृष्टि कमजोरी के रूप में नहीं दिखती बल्कि यह मुझे अन्य लोगों से भिन्न बनाती है। ताकि मैं एक समान सभी को समान अधिकार दिला सकूं। लक्ष्य निर्धारण करते वक्त मुझे किसी का चेहरा नहीं दिखाई देता बल्कि मैं लक्ष्य को लेकर ही चलता हूं।

एसडीओ व एडीएम के रूप में काम कर चुके हैं राजेश

2007 बैच के राजेश सिंह ने बतौर डीसी अपनी पहली पदस्थापना के लिए सीएम हेमंत सोरेन के निर्णय को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा कि चूंकि वह एसडीओ व एडीएम के रूप में काम कर चुके हैं। इसलिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण तो नहीं, परंतु कोरोना काल की विकट परिस्थिति में डीसी के पद पर काम करना यकीनन एक चैलेंजिंग जॉब होगा।

आपको बता दें कि आईएएस राजेश सिंह को झारखंड सरकार ने बोकारो का उपायुक्त बनाया है. राजेश सिंह झारखंड सरकार में उच्च तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास विभाग के विशेष सचिव थे.

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