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पूछ रहा है देवघर का ‘इतिहासघर’, क्यों किया मुझे ‘बेघर’ ?

उमेश कुमार  Written By:उमेश कुमार

देवघर। 

महात्मा गांधी ने कभी लिखा था कि "हमें अपने इतिहास का समादर करना चाहिए, क्योंकि  यहीं से हमारे सुनहरे भविष्य की राहें निकलती हैं" .पर, कथित 'विकास' के मद में बौराया देवघर अपने इतिहास को बिसराए जा रहा है! देवघर इस शताब्दी का शायद ऐसा पहला शहर है जहां नागर सुविधाओं के नाम पर राष्ट्रीय इतिहास के स्मृतिचिन्हों को बेदर्दी से मिटाया जा रहा है. पहले राजा मानसिंह की निशानी मानसरोवर, फिर महान् स्वतंत्रता सेनानी नथमल सिंहानिया की यादगारी कांग्रेस भवन. यह तो निजाम बदल गया वरना पुराना सदर अस्पताल भवन के साथ 'वक्त की आवाज' टावरघड़ी भी लोलुप निगाहों की जद में आ चुकी थी. बहरहाल, इस कतार में एक नया नाम शामिल हो ही गया- इतिहासघर। 

अरवा राजकमल                                                                                  'इतिहासघर' का अवलोकन करते देवघर के पूर्व उपायुक्त अरवा राजकमल

सन् 2019 के आखिर में नया सदर अस्पताल, कालीराखा स्थित रेडक्रास सोसायटी भवन के ऊपरी माले पर 'झारखंड शोध संस्थान' द्वारा संचालित 'इतिहासघर' को वहां से हटा दिया गया है. इस कारण बहुमूल्य ऐतिहासिक प्रर्दश, तैलचित्र, प्रतिकृतियां, पुस्तकें,पांडुलिपियां आदि सड़क पर आ चुकी हैं। 

इतिहास घर                                                                                      कभी ऐसी थी 'इतिहासघर' में लोगों की आमदरफ्त                                                                     

आउटसोर्सिंग कंपनी के लिए खाली कराया गया 'इतिहासघर'

दरअसल, अस्पताल प्रबंधन ने रेडक्रास भवन के 'इतिहासघर' में आउटसोर्सिंग कंपनी के सहयोग से एक डायलिसिस सेंटर खोल दिया है. इस क्रम में नीचे माले पर कार्यरत रेडक्रास सोसायटी की देवघर शाखा से भवन को अस्पताल प्रबंधन के अपने अधिकार में ले लिया है.

नैंसी सहाय                                                                           'इतिहासघर' के भवन की व्यवस्था के लिए शिष्टमंडल द्वारा उपायुक्त नैन्सी सहाय को पत्र

'इतिहासघर' बचाने की गुहार 

'इतिहासघर' के संचालक एवं इन पंक्तियों के लेखक ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में डायलिसिस जैसी पहल की सराहना करते हुए अस्पताल और जिला प्रशासन से 'इतिहासघर' के निमित्त दो-चार कमरों का कोई दूसरा भवन देने की गुहार लगाई है. अनुरोधपूर्वक कहा है कि वह सेहत के क्षेत्र में किए जाने वाले किसी सरकारी प्रयास का विरोध नहीं करता, पर यदि कहीं इतिहास का कोई कोना बनाया गया है तो उसे उजाड़ने से पहले कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए. ऐसा इसलिए, क्योंकि 'इतिहासघर' देवघर जिला प्रशासन द्वारा आवंटित जगह पर ही बनाया गया था. वहां देवघर के स्थानीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व से संबंधित दुर्लभ तस्वीरें, प्रतिकृतियां, तैलचित्र पुरावशेष, पुस्तकें, पांडुलिपियां आदि संग्रहीत किए गए थे. निश्चित आर्थिक व्यवस्था के अभाव के बावजूद वहां स्थानीय इतिहास के प्रदर्शन के साथ उनके डाक्यूमेंटेशन और पब्लिकेशन‌ का महत्वपूर्ण काम हो रहा था. इससे नई पीढ़ी को गौरवशाली स्थानीय विरासत के प्रमुख तत्वों को जानने-समझने में मदद मिल रही थी.कहना न होगा, अब इस रचनात्मक प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न हो गया है.

ग्रामोफ़ोन                                                                                      'इतिहासघर' का आकर्षण बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा देवघर-प्रवास (1937 ई.) के दौरान बजाया गया ग्रामोफोन।

जिला प्रशासन के सहयोग से ही बना 'इतिहासघर'

ज्ञातव्य है कि इस 'इतिहासघर' की स्थापना दिनांक 14 जनवरी,2015 को तत्कालीन उपायुक्त अमीत कुमार जी के द्वारा रेडक्रास सोसायटी भवन(कालीराखा) के ऊपरी माले पर आवंटित स्थान पर की गई थी. अनेक इतिहास प्रेमियों की उपस्थिति में विधायक नारायण दास और तत्कालीन उपायुक्त अमीत कुमार ने इसका उद्घाटन किया था. अब तक अनेक इतिहासप्रेमियों के साथ गोड्डा सांसद डॉ निशिकांत दुबे, पूर्व नगर विकास और आवास मंत्री सी.पी.सिंह, पूर्व श्रम मंत्री राज पलिवार, देवघर विधायक नारायण दास,डिप्टी मेयर नीतू देवी, पूर्व उपायुक्त अरवा राजकमल, पंडा धर्मरक्षिणी सभा के अध्यक्ष डॉ.सुरेश भारद्वाज, सूचना-विज्ञान पदाधिकारी ए.बी.राय, सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रो.ताराचरण खवाड़े, डॉ.अनिरुद्ध ठाकुर, डॉ.मोतीलाल द्वारी, डॉ.शंकर मोहन झा,  डॉ.अरुणादित्य सहाय, डॉ.नीरजा दुबे, डॉ.बसंत कुमार गुप्ता, प्रो.रामनंदन सिंह, संगीतकार एस.डी.द्वारी, पत्रकार शत्रुध्न प्रसाद, पूर्व सिविल सर्जन डॉ.आर.एन.प्रसाद, डॉ.शिवचंद्र झा, डॉ.तिवारी, डॉ.एन.सी.गांधी, डॉ.संजय कुमार, समाजकर्मी घनश्याम भाई, कुमार रंजन, डॉ.मनोज, सुशीला सिन्हा, संजय कुमार उपाध्याय, गंगा नारायण सिंह, वाणिज्य कर सहायक आयुक्त संजय कुमार राव सहित कई गणमान्य लोग 'इतिहासघर' का अवलोकन कर चुके हैं.

पेंटिंग                                                                              'इतिहासघर' की दीवार पर सजी थीं देवघर के प्रमुख संगीतकारों की तस्वीरें 

स्थायी भवन देने से पहले डीसी का तबादला

पूर्व उपायुक्त राहुल कुमार सिन्हा की 'इतिहासघर' पर बड़ी श्रद्धा थी. इससे पहले कि वे दूसरे भवन की व्यवस्था कर पाते, उनका स्थानांतरण हो गया. विगत वर्ष के चार और 12 अक्तूबर,19 को इन पंक्तियों का लेखक संताल-पहाड़िया सेवा मंडल की पूर्व गृहमाता सुशीला सिन्हा के नेतृत्व में दो बार (एक शिष्टमंडल के साथ) वर्तमान उपायुक्त नैन्सी सहाय से मिलकर 'इतिहासघर' को बचाने की गुहार लगा चुका है. नवंबर-दिसंबर,2019 से जनवरी-फरवरी,2020 तक  संवाद का क्रम बना रहा. उपायुक्त मैडम ने समस्या को गंभीरता से लेते हुए शिष्टमंडल को कोई दूसरा भवन देने का आश्वासन दिया है. उन्होंने एस डी ओ विशाल सागर को जांचोपरांत किसी उपयुक्त भवन की व्यवस्था का निर्देश भी दिया है. विशाल सागर ने भवन की व्यवस्था के लिए कुछ जगहों पर पत्र लिखे और फिर जांच का जिम्मा मजिस्ट्रेट मीनाक्षी भगत को सौंप दिया. लेकिन, इसके बावजूद 'इतिहासघर' अब तक बेघर है और उधर डायलिसिस सेंटर वाले बचे-खुचे पुरावशेषों को भी हटाने का दबाव दे रहे हैं.

गाँधी चित्र                                                                                    अधूरी रह गई 'बापू और बैद्यनाथ' शीर्षक चित्र-दीर्घा को नूतन ढंग से सजाने की योजना

अधूरी रह गई गांधी चित्र-दीर्घा को संवारने की योजना

'इतिहासघर' में महात्मा गांधी के देवघर-संदर्भ पर आधारित एक चित्र-दीर्घा बनाई गई थी. महात्मा गांधी की 150 वीं वर्षगांठ पर इस चित्र-दीर्घा को नए सिरे से संयोजित कर लोगों को दिखाने की योजना थी. पर, अस्पताल प्रबंधन द्वारा बिना वैकल्पिक व्यवस्था के भवन खाली कराने की हठधर्मिता और तालाबंदी से हम इतिहास प्रेमियों में मायूसी है. हम सभी शासन-प्रशासन से देवघर की इतिहास-यात्रा को एक ठौर देने की जरूरत को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं. खासकर, उनके लिए जो वर्षों से गरीबी की पलकों से इतिहास का आंगन बुहार रहे हैं.

के सहाय                                                                                  'इतिहासघर' में स्थापित थी देवघर के महान् इतिहासकार स्व. के.एन.सहाय(1914-2009ई.) की आवक्ष प्रतिमा. इस प्रतिमा को अब एक किनारे कर दिया गया है। 

 

लेखक उमेश कुमार , झारखण्ड शोध संस्थान देवघर के सचिव हैं।

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