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चलो गाँव की ओर …..

Nitin piryadarshi Written By: डॉ. नीतीश प्रियदर्शी

रांची। 

आज जिस तरीके से कोरोना महामारी  की वजह से छोटे से लेकर बड़े शहर तक लॉकडाउन हैं। वहीं हमारे बहुत से गाँव आज भी इस महामारी से दूर हैं। लोग अपने घरों से दूर दूसरे शहरों में भूख से मर रहें या खाने को नहीं मिल रहा है, वही गाँव में सब्जियां और अनाज खेतों में बर्बाद हो रही हैं। अगर आज हमारा गाँव उन्नत होता तो लोग शायद अपने खेतों को छोड़ के दूसरे शहरों में नौकरी की तलाश में नहीं जाते और शहरों पर भी बोझ कम पड़ता।

भारत में गरीब मजदूरों के आंतरिक पलायन में वृद्धि हो रही है। अनौपचारिक क्षेत्र में गरीब आमतौर पर आकस्मिक मजदूरों के रूप में पलायन करते हैं। प्रवासियों की ऐसी जनसंख्या में रोग फैलने की संभावना ज्यादा होती है और उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता भी कम होती है। वर्ष 2001 की जनगणना अवधि के दौरान देश में ज्यादा आर्थिक लाभ वाले शहरों या दूसरे इलाकों में काम करने के लिए 14 करोड़ 40 लाख लोगों ने प्रवास किया।बीते कुछ सालों में गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने वाले ग्रामीण जनों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी देखी जा रही हैं। इससे कई प्रकार के असंतुलन भी उत्पन्न हो रहे हैं। शहरों पर आबादी का दबाव बुरी तरह बढ़ रहा है, वहीं गांवों में कामगारों की कमी का अनुभव किया जाने लगा है। 

खेत

आज के समय में गाँव की महत्ता और भी बढ़ गई है। दो साल पहले मैंने झारखण्ड के कुछ गाँव में किसानो से बात की तो पता चला कि खेती में ज्यादा फायदा नहीं होने से उनके बच्चे शहरों में जाके कामना बेहतर समझ रहे हैं। खेतों पर खतरा मंडरा रहा है जो एक खतरनाक संकेत है। उच्च शिक्षा और आरामदायक जीवन की अपेक्षा में गांव से जुड़े लोगों ने शहरों की ओर पलायन करना जो शुरू किया, तो यह क्रम और तेजी पकड़ता गया। नतीजतन खेती-बाड़ी छूटने लगी और जमीनें बंजर हो गईं। नवीनीकरण के चक्कर में हम लोग अपनी जड़ों से जुदा हो चुके हैं। आज हाल यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था में खेती से होती आय का प्रतिशत काफी कम हो चुका है। फल सब्जियों को कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है। फ़ास्ट फ़ूड का चलन तेज़ी से बढ़ा है, फलस्वरूप स्वाद और स्वास्थ्य दोनों ही बिगड़ चुके हैं। नई बीमारियां जन्म लेने लगी हैं। 

अगर खाने को अनाज और सब्जियां नहीं मिलेंगी तो आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि भविष्य में कैसी महामारी आएगी। ये दुर्भाग्य है कि बहुत से लोगों का संपर्क अपने गाँव से ख़त्म हो चूका है या फिर अपने जमीनों को बेच के शहर के दड़बों में रहने आ गए।  कोरोना की महामारी को देखते हुए ये तो तय है कि आने वाले समय में गाँव की महत्ता बढ़ेगी।  क्योंकि आज भी गाँव का जीवन शांतिदायक होता है।  यहाँ की वायु महानगरों की वायु की तरह अत्यधिक प्रदूषित नहीं होती । इसमें कोई शक नहीं कि जो लोग हरियाली के नज़दीक रहते हैं, उन पर किसी भी तरह के प्रदूषण का असर कम होता है।  तनाव भी कम होता है।  अगर आज भी गाँव की मूलभूत सुविधाओं को उन्नत किया जाए तो युवाओं का पलायन कम हो जायेगा।  अगर मै झारखण्ड की  गाँवों की बात करूँ  तो यहाँ नैसर्गिक खूबसूरती के अलावा खेत की मिट्टी उपजाऊ भी है।  खेतों की उपजी ताज़ी सब्जियों की मांग दूसरे राज्यों में भी है।  बस कमी एक ही है की मार्केटिंग की समुचित व्यवस्था नहीं है।  किसानो को उचित दाम नहीं मिलता। 

खेती

मैंने देखा की कुछ वर्ष पहले रांची के पास प्रसिद्ध हुंडरू फाल्स के एक गाँव के किसानो को अपने खेत की सब्जियों को ओने पौने दाम में बेचते हुए।  मैंने जब भाव पुछा तो किसानो ने कहा जो भी इच्छा हो दे दीजिये। कारण था कि जिस गाड़ी से वो रांची शहर आ के सब्जी बेचते थे वो उस दिन नहीं आया था।  मुझे लगता है जिनके गांव-घर हैं, खेत-खलिहान हैं, उन लोगों को अपनी नौकरी का मोह छोड़कर कुछ ध्यान अपने खेतों पर भी देना चाहिए। आज इंटरनेट की मदद से कई नई तकनीकों की जानकारी ली जा सकती है। आप जितना मेहनत दूसरों के लिए  करंगे अगर उतना मेहनत अगर आप अपने खेतों में करें न तो नौकरी जाने का तनाव और न ही घर से दूर होने का दुख। 

लॉक डाउन और इस महामारी के खत्म के बाद सरकार को इस पर अब विशेष ध्यान देने की जरुरत है कि आने वाले भविष्य गाँव से कम से कम पलायन हो।  नहीं तो आज जो प्रवासी मजदूरों को वापस लाने की जो ख़राब स्थिति बनी हुई है वो भविष्य में और भी बढ़ेगी।  सरकार को चाहिए कि जो गाँव पिछड़े हुए हैं उनपर विशेष ध्यान दे और उसको आदर्श गाँव बनाये की उस गाँव से पलायन किये हुए लोग वापस आ जाएं।  अगर हमारा गाँव स्वस्थ रहेगा तभी हमारा शहर और समाज स्वस्थ रहेगा।  

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी पर्यावरणविद एवं प्रोफेसर भूगर्भ विज्ञान विभाग, रांची विश्वविद्यालय। उक्त बातें लेख़क के निजी विचार है।

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