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ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास के लिए गांधीवादी मॉडल की जरूरत 

 नागेश्वर sharma By डॉ0 नागेश्वर शर्मा

सर्वविदित है भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ ग्रामीण प्रधान देश भी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत के इस स्वरूप को देखते हुए ही कहा था कि भारत गांवों में निवास करती है। इण्डिया रिजाइड्स इन द विल्लेजेज। गांव भारत की आत्मा है।1990 में भारत सरकार ने नई आर्थिक सुधार नीति अपनाई। विकास के नये मॉडल ने पुराने मॉडल का स्थान ले लिया। भारत भी ग्लोबल विल्लेज का हिस्सा बन गया।

शहर औद्योगिक हब बनते गया ।उद्योगों का केनद्रीयकरण शहरों के आसपास होने लगा ।रोजगार के नए अवसरों का सृजन होना शुरू हुआ ।रोजी-रोटी की तलाश में न केवल कुशल वल्कि अकुशल मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ ।ग्रामीण उद्योग धंधों का यही से पतन प्रारंभ हुआ ।कुटीर एवं लघु उद्योग जो घर और ग्रामीण लोगों द्वारा चलाए जाते थे, धीरे-धीरे समाप्त हो गये ।कृषि के अतिरिक्त रोजगार का कोई साधन बचा नही। परिणामस्वरूप शहरीकरण बड़े पैमाने पर शुरू हुआ ।

शहरीकरण के बावजूद 65 -66 प्रतिशत लोग गांव में रहते हैं:

कृषि के अलावे आजीविका का कोई दूसरा प्रमुख साधन नही रह गया ।छोटे एवं मझोले जोत वालों के लिए कृषि लाभकारी व्यवसाय नही रह गया ।हरित क्रांति के बाद से ही किसानी महंगी होती चली गई ।डिस्गाइज्ड बेरोजगारी की अलग समस्या ।परिवार के सभी सदस्यो का छोटी सी जोत पर आश्रित रहना ।सीमांत उत्पादकता में वृद्धि न होना ।इन कारणों के चलते सीमांत एवं लघु जोत वालों के लिए कृषि अलाभकारी व्यवसाय बन गया ।ये खेतिहर जीविका की खोज में शहरों की ओर रुख किए।शहरीकरण एवं शहरों में स्लम्स की उत्पत्ति के पीछे की यही वजह है ।

1 अप्रैल 1951 से भारत ने नियोजित विकास की प्रक्रिया शुरू की। यह सोवियत रूस से उधार ली गई प्रक्रिया थी। सोवियत रूस में गोसप्लान था। प्रथम पंचवर्षीय योजना को छोड़कर बाकी सभी योजनाओं यानी द्वितीय योजना से लेकर बारहवीं योजना, सभी में उद्योगों के विकास विकास पर जोर दिया गया। सनद रहे कि भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर एवं बोकारो में आयरन एंड स्टील प्लांट की स्थापना द्वितीय एवं तृतीय योजना में ही हुई थी । औद्योगिक नगर विकसित होते गए। गांव पिछड़ते चला गया. विकास के दो प्रमुख स्वरूप हैं – संतुलित विकास एवं असंतुलित विकास।असंतुलित विकास ने देश में असमानता पैदा की।

असंतुलित विकास और कोरोना संकट:

आज असंतुलित विकास के परिणाम सामने हैं ।कोरोना वायरस और उससे उत्पन्न लाकडाउन के परिणामस्वरूप उद्योग एवं उससे जुड़े वायप्रोडक्ट इन्डस्ट्री बंद हैं । सरकारी /सार्वजनिक उपक्रमों में नौकरी सुरक्षित है, पर वेतन, महंगाई भत्ते पर वहां भी आफत आ रही है ।निजी क्षेत्र के उपक्रम के बंद होने से कुशल एवं अकुशल श्रमिक बड़े पैमाने पर बेरोजगारी के शिकार हुए हैं ।केवल झारखंड के 5-6 लाख लोग रोजगारविहीन अवस्था में फंसे हुए हैं ।रिवर्स पलायन की समस्या आ पडी है ।ऐसे मजदूर जब गाँव आयेंगे और लाकडाउन हटेगा, तो इनके सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार प्राप्त करने की रहेगी। गांव में मुकम्मल रोज़गार की कोई व्यवस्था है नही।

बता दें कि कृषि का विगत दो-तीन दशकों में काफी डाइवरसिफिकेशन हुआ है ।मशीनीकरण के चलते वहां भी रोजगार में कमी आई है । खेती -किसानी में काफी विविधता तो आई है, लेकिन कृषि का जी डी पी में योगदान काफी घट गया है ।प्रथम पंचवर्षीय योजना में जहां कृषि का जी डी पी में 40 प्रतिशत योगदान था, वह घटकर आज 12 प्रतिशत रह गया है ।कृषि सम्बद्ध व्यवसायों मसलन के तौर पर मत्स्यपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन आदि के हालात बहुत अच्छे नही हैं ।ऐसे में एकमात्र मनरेगा ही रोजगार देने वाला कार्यक्रम है ।लेकिन गौरतलब है कि विगत तीन बजट में मनरेगा के लिए आवंटित राशि में मामूली वृद्धि हुई है ।मजदूरी की दर में वृद्धि के कारण रोजगार के अवसर में वृद्धि की उम्मीद नही के बराबर है ।फिर मनरेगा जो विश्व चर्चित रोजगार एक्ट है, भ्रष्टाचार से अछूता नही है ।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था कैसे हो मजबूत:

अब सवाल है तब ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत और रोजगारपरक बनाया जा सकता है? इस सवाल का उत्तर गाँधीवादी विकास माडल में छुपा हुआ है ।कृषि के अलावे कुटीर एवं सूक्ष्म उद्योगों को विकसित किया जा सकता है ।संतालपरगना में अनेकों ऐसे उद्योगों की असीम संभावनाएँ हैं ।रेशम पालन से जुड़े कुटीर उद्योग को विकसित किया जा सकता है ।गोड्डा के सुन्दरपहाडी के रेशमी धागे से गिदैया (पीरपैती)में रेशमी वस्त्र एवं साड़ियां तैयार ही नही की जा रही है , बल्कि रोजगार भी उपलब्ध कराया जा रहा है ।काठीकुन्ड (दुमका )में भी इसी तरह के उद्योग चलाये जा रहे हैं ।झारखंड में मधुमक्खी पालन उद्योग की भी संभावना है ।कुटीर उद्योग के रूप में इसे विकसित किया जा सकता है । इसके लिए अधिक पूंजी की जरूरत भी नही पडती है।मत्स्यपालन के द्वारा भी गांवो मे रोजगार सृजित किया जा सकता है ।

महुआ झारखंड में एक फसल है। इससे कई चीजें कुटीर एवं लघु उद्योग में तैयार की जा सकती है। इसके फल से तेल तैयार करने वाले कुटीर उद्योग खोले जा सकते हैं। गांधी जी ऐसे उद्योगों के हिमायती थे। छोटी पूंजी एवं छोटी मशीनों से ऐसे उद्योगों को विकसित किया जा सकता है। गांधी जी बड़ी मशीनों के विरूद्ध थे। वे विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। वे ग्रामीण हुनर आधारित उद्योगों को विकसित कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। ग्राम स्वराज उनकी कल्पना थी ।गांधी के बाद उनके विकास माडल को हमारे नीति-निर्माताओ ने भुला दिया ।विकास के पाश्चात्य माडल को अपनाया गया ।आज जब देश में कोरोना वायरस से उत्पन्न संकट ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुन:एक बार स्वावलंबी बनाने की चेतावनी दी है, तो हमें गांधीवादी विकास माडल को अपनाने की पहल करनी होगी

लेख़क प्रोफेसर (डॉक्टर )नागेश्वर शर्मा भारतीय आर्थिक परिषद के संयुक्त सचिव है. ये लेखक के निजी विचार है.

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