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कुदरती करार की कहानियां !

umesh  पुस्तक-समीक्षा By: उमेश कुमार 

देवघर।

प्रो.आनंद बहादुर समकालीन रचनात्मक परिदृश्य के विशिष्ट नामों में शुमार हैं. उनका जन्म 17 जुलाई,1961 को देवघर में हुआ था. देवघर की साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश पर अपनी मेधा की अमिट छाप छोड़कर अब वे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में रजिस्ट्रार हैं. उनकी सारस्वत साधना अब और प्रखर हो चुकी है.'ढेला और अन्य कहानियां' उनका सद्य: प्रकाशित कहानी-संग्रह है. यह संग्रह 'लाकडाउन' के एन पहले आया है. लिहाजा,जो नए तेवर की कहानियां पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह एक पसंदीदा किताब हो सकती है.

127 पेज की इस किताब में कुल दस कहानियां हैं.सभी कहानियों की स्थितियां-परिस्थितियां अलग-अलग हैं। अपनी शैली में प्रो.आनंद बहादुर किसी एक निर्जीव चीज, अनगढ़ उपकरण,स्थान, वय या परिस्थिति विशेष को उठाते हैं. फिर सधे शब्दों में उसे आंकते हुए कथा-पात्रों की उधेड़बुन, घबराहट, दुविधा और उनकी दृष्टि के विस्तार से गुजरते हैं. पात्रों की मानसिक बुनावट को पढ़ने के लिए गहरे उतरते हैं. यहीं अतल के उन मनोवैज्ञानिक तंतुओं से उनका मेल होता है जो प्रकरांतर से तमाम आरोह-अवरोह के लिए जवाबदेह हैं. इसी जगह वे अपने निष्कर्ष को स्थापित भी करते हैं. बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिकता के.प्रो.आनंद बहादुर की समझ से सबकुछ कुदरती होना चाहिए.और,सहज भी. पाठक को लगना चाहिए कि यहीं चिरशांति है. चारुता और प्रगति भी.

पहली कहानी 'ढेला' अनगढ़ से रास्ते पर उमगते किसी मानसिक स्फोट की तरह है. स्कूटर सवार नायक के अचेतन मन में यह ढेला पैवश्त है. इसलिए,निरंतर कौंधता है. मानो महानगरीय जीवन के साथ उसका कस्बाई मन एक युति, एक सहजता स्थापित करने की नाकाम जद्दोजहद में हो. आशा-निराशा से दो-चार.उसके हाथों से नोटों का यकायक गिरना जैसे एक खास नागर जीवन में उसके अबतक 'फिट' न हो पाने की दुविधा का चरम है. 'साइनबोर्ड' में कथाकार प्रो.आनंद बहादुर रिटायर्ड किरानी कामता प्रसाद की दिखावटी दुनिया से असहजता को चित्रित करते हैं. लेकिन, आरंभ में खब्बू सरीखे दर्शाए गए कामता प्रसाद के व्यक्तित्व का एकाएक 'कायांतरण' पाठकों को कुछ चकित करता है. उनके आदर्शों की ऐंठन भी खलती है. खुद एक निश्चित आर्थिक लाभ की चाकरी और बेटे-बेटियों द्वारा अपनी व्यावसायिकता को बाजार देने के लिए 'साईनबोर्ड' पर ऐतराज का कोई खास मतलब नहीं दिखता.कहानी में जहां सभी पात्रों का पृथक परिचय भाता है, वहां 'आरक्षण' के साथ 'बोदे' की उपमा पर बहुतों की आपत्ति हो सकती है.वंचित वर्ग ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा को साबित किया है.और ये 'बोदे' तो गैर आरक्षण वाली जमातों में भी पाए जाते हैं.बहरहाल, कहानी हठात् अंत की ओर उन्मुख लगती है,कामता प्रसाद की शख्सियत में चमत्कारिक बदलाव के साथ.लेकिन,उनका गांव यानी प्रकृति की ओर लौटना अच्छा संदेश देता है.'खिलवाड़' दरअसल  उपभोक्तावादी महानगरीय जीवन और बाजारवाद के प्रभाव के बीच हस्तक्षेप करती कुदरती शक्ति का एक रूपक है. अनंत शोर के बीच बुनी गई शाश्वत शांति की दास्तान!

बुक

संग्रह की कहानी 'कीड़े' भी इसी शिल्प में बुनी कहानी है जहां असंख्य कीड़े रफ्तार मारती कार के पहिए थाम लेते हैं. ये कीड़े व्यवस्था (व्यक्तिगत और प्रतिष्ठानिक – दोनों तरह के मद) के खिलाफ खदबदाती बेचैनी और विद्रोह के प्रतीक हैं. अपनी परिणति में ये अंततः 'जन' को प्रभावित करते हैं, इसलिए कथाकार इसे जन-विद्रोह के आवेग में गूंथते हैं.इनकी भन्नाहट दूर तलक पीछा करती है…

संग्रह की 'शिशु' शीर्षक कहानी में प्रो. आनंद बहादुर बालमन की अस्फुट,अतल गहराइयों की थाह लेने का जतन करते हैं. मनोविज्ञान से लिपटे अनूठे  शैशव-बोध और  बारीक तारों पर अंगुली रखते कथाकार का कौशल पाठकों को चमत्कृत  करता है. इस कारण, कृत्रिम श्रृंगार धरी मां की गोदी में स्नेह की नैसर्गिक, परिचित सी गंध टटोलते  शिशु की उलझन पाठकों को मोहित करती है. 'दूध का पत्थर' कुछ-कुछ ऐसा ही आस्वाद देती, जाति और वर्ग भेद की लकीरें मिटाती जान पड़ती है.

'थाने की दीवार' मौजूदा सियासत और उनके सूरमाओं की खुदगर्जी की परतें खरोंचती एक रफ्तार रचती है. छाने और पाने की रफ्तार. यहां रिस्क लेने की फंतासी के बीच व्यक्तिवादी नेतृत्व उभार लेता है.जयभगवान द्वारा तेज रफ्तार हाइवा को ( जख्मी होने की कीमत के बावजूद) थाने की दीवार पर पेल देना आज के नेताओं की आक्रामक चुनावी चालों और किसी भी तरीके से सुविधा चाहने वाले मतलबी मतदाताओं के भ्रम को एक रोचक घटनाक्रम की विश्वसनीयता देता है. इस क्रम में 'पार्टी के बाद' नीरा और नायक के बीच के फासले मानो 'शांति और ठंडापन' ही पाट रहे होते हैं.यानी एक कुदरती एहसास!

 'पिघलते शीशे' में परिस्थितियोंवश दो प्रेमियों की विरह-वेदना की खंदक दिखाई गई है. बंदिशों और लानतों की खंदक. उम्र के एक मोड़ पर आकर नीरू और श्री मिलते हैं. लेकिन,मिलन-यामिनी की कृत्रिम सज्जा,सिंगार,वस्त्र-विन्यास ही नहीं रोमानी फूलों की गमक तक दोनों को असहज बनाती है.कायिकता के बीच एक अदृश्य सी लपट भभकाती है.इसमें बंदिशों और बनावटीपने की गहरी खीझ भी शामिल है.लिहाजा,सुहाग सेज के महकते फूलों, चादरों और चोगों से जब तलक दोनों मुक्त नहीं होते, कुदरती तौर पर एकाकार नहीं हो पाते.इसप्रकार,कुदरती सहजता की मंजिलें तय कर ही आनंद बहादुर की कहानियां विराम पाती हैं और पाठक करार.

निवेदिता शंकर का आवरण संग्रह के मूड को स्पष्ट करता है. टंकन, साज-सज्जा के साथ संपूर्ण मुद्रण में एक सौम्यता है.

पुस्तक के समीक्षक उमेश कुमार , झारखण्ड शोध संस्थान देवघर के सचिव हैं। 

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