Global Statistics

All countries
352,506,437
Confirmed
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm
All countries
278,150,631
Recovered
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm
All countries
5,616,225
Deaths
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm

Global Statistics

All countries
352,506,437
Confirmed
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm
All countries
278,150,631
Recovered
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm
All countries
5,616,225
Deaths
Updated on Monday, 24 January 2022, 6:57:02 pm IST 6:57 pm
spot_imgspot_img

क्या सवा सौ करोड़ वाले भारत को सवा दो करोड़ आबादी वाले ताईवान से सीखने की है ज़रूरत?

By: गुंजन सिंहा

रात के तीन बज चुके हैं और मैं सोच रहा हूँ कि क्या सवा सौ करोड़ वाले भारत को सवा दो करोड़ आबादी वाले ताइवान से कोई शिक्षा लेनी चाहिए?

ताइवान और दुबारा शानदार तरीके से उसकी राष्ट्रपति चुनी गई त्साई वेन-इंग को बधाई दिए बिना सोने चले जाना आज़ादी की उस भावना का अपमान होगा, जिसके दम पर छोटे से ताइवान (कुल क्षेत्रफल – 36000 वर्ग किलोमीटर) ने खुद से सौ गुना बड़े, डेढ़ सौ करोड़ आबादी वाले अजगर (चालीस लाख वर्ग किलोमीटर) को खुली चुनौती दे रखी है. 

ताइवान में 11 जनवरी, 2020 को एक तरह से चीन-समर्थक और चीन-विरोधी धाराओं के बीच चुनाव हुआ था. इस चुनाव के पहले राष्ट्रपति त्साई ने ताइवान में चीनी हस्तक्षेप के खिलाफ कड़े क़ानून बनाए और फिर जबरदस्त जन-समर्थन पाकर दुबारा राष्ट्रपति बनी. लेकिन इस बीच एक बड़ी घटना हो गई. 30 दिसंबर, 2019 को कानून बने और 2 जनवरी, 2020 को, यानी चौथे दिन, ताइवान के प्रधान सेनापति शेन यी-मिंग एक हेलीकाप्टर दुर्घटना में मारे गए. 

याद होगा कि आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भी ताइवान में ही विमान दुर्घटना में मारे गए थे. वह दिन था 18 अगस्त, 1945. आज तक हम निश्चित रूप से नहीं जान सके कि वह दुर्घटना थी या हत्या. और यह भी हम निश्चित रूप से शायद कभी नहीं जान सकेंगे कि ताईवानी प्रधान सेनापति शेन यी-मिंग की मृत्यु एक विमान हादसा थी या हत्या, और अगर हत्या थी तो क्या इसके पीछे चीन का हाथ था ? या चीन को बदनाम करने के लिए अमेरिका का ? या फिर यह सिर्फ एक हादसा ही था? 

ये सब हम नही जान सकेंगे. लेकिन कुछ और जानकारियाँ हैं, जिन्हें हमें अवश्य जानना चाहिए. ये जानकारियाँ अपने देश की हैं, एकदम ताज़ा हैं, लेकिन उनमें बदबू पुरानी है. वैसे इन बदबूदार बातों के पहले हम थोड़ा उस ख़ास महिला, राष्ट्रपति त्साई वेन-इंग, के बारे में बताते चलें जो एक राष्ट्राध्यक्ष ही नही, एक महिला के रूप में भी हमारे लिए प्रेरणादायक हो सकती हैं. 

31 अगस्त, 1956 को एक ऑटो-मेकैनिक की 11 वीं संतान के रूप में जन्मी त्साई वेन-इंग क़ानून की प्रोफ़ेसर रही हैं. अविवाहित हैं, और अपने प्रगतिशील विचारों की बदौलत उन्होंने अपने देश को आर्थिक के साथ मानसिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रगति के कई नए आयाम दिए हैं. 

उन्होंने 2015 में वैवाहिक समानता के अधिकारों की घोषणा करते हुए कहा था कि “मैं समानता का समर्थन करती हूं. आइये! हम सभी को स्वतंत्र रूप से प्यार करने और खुशी पाने में सक्षम होने दें”. 

उनका वादा है कि वे अगले पाँच वर्षों में ताइवान को परमाणु-ऊर्जा से मुक्त देश बना लेंगी तथा पर्यावरण को सुरक्षित करेंगी. चीन के खिलाफ अपने कठोर रुख के आधार पर उन्होंने चुनाव जीता है. और यह एक आश्चर्य की बात है कि इस छोटे से देश की इस राष्ट्रपति के पास इतना हिम्मती कलेजा है जितना शायद 56 इंच में नही है. चीन आज भी ताइवान को अपना एक प्रान्त मानता है जबकि ताइवान खुद को आजाद मानता है. उसकी अपनी पूरी स्वतंत्र व्यवस्था और संपन्न आर्थिक स्थिति है. यह दुनिया में 21वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 

अब हम देखें कि ताइवान की तुलना में चीन के साथ अपने सम्बन्धों में भारत का सीना कितना सीधा और सुरक्षित है.  

ताइवान के चुनाव और चीनी वर्चस्व को उसकी चुनौती के साथ ही यह खबर भी हाल के अख़बारों में है कि हमारे यहाँ अभी 5G के ट्रायल होने वाले हैं. इसमें भारत सरकार दुनिया की एक दर्जन बड़ी टेलिकॉम कंपनियों को आमंत्रित कर रही है. लेकिन भारत ने चीन की हुअवेइ कम्पनी को नहीं निमंत्रित किया. हुअवेइ पर अमेरिका ने अपने यहाँ रोक लगा रखी है और उसने अन्य देशों सहित भारत से भी आग्रह किया है कि वे इस चीनी कम्पनी को अपने यहाँ नहीं आने दें. वज़ह ये है कि इस कंपनी का घनिष्ठ सम्बन्ध चीनी सेना से है और यदि यह बड़े पैमाने पर अमेरिकी टेलिकॉम व्यवस्था में प्रवेश पा लेगी तो उससे अमेरिका की सुरक्षा को खतरा हो सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह भी आरोप लगाया था कि हुअवेइ चीन के जासूसी तंत्र का हिस्सा है. तो अमेरिकी दबाव में भारत ने जुलाई में तय कर लिया कि हुअवेइ को ट्रायल में शामिल नहीं किया जाएगा. 

चीन और भारत की भौगोलिक स्थिति प्रतिद्वंद्वी की है. दोनों के बीच एक बड़ा युद्ध 1962 में हो चुका है. भारत की काफी जमीन चीन ने दबा रखी है. कई इलाकों में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है. हमारे अधिकाँश पड़ोसी देशों – पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और नेपाल में चीन का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है. हिन्द महासागर में चीनी जलसेना की गतिविधियाँ बढ़ रही हैं.  भारत के बाज़ार और उत्पादन क्षेत्र में भी चीन की चुनौती भारत के लिए बेहद चिंताज़नक है. इन सभी मुद्दों के मद्दे नज़र अपने बेहद ताकतवर और विस्तारवादी पड़ोसी के प्रति भारत को सतर्क रहना चाहिए था. भारत था भी, इसीलिए उसने हुअवेइ कम्पनी को शुरू में निमंत्रित नहीं किया था, लेकिन चीन ने भारत के खिलाफ प्रतिबन्ध की धमकी दी. अब भारत ने हुअवेइ को भी निमंत्रित कर लिया. और यह घोषणा भी केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कर डाली. लेकिन उन्होंने या उनके विभाग ने न तो पहले कभी बताया कि नीति में इस अचानक यू-टर्न की वजह क्या है. ‘ना ना कहते प्यार तुम्ही से कर बैठे?’ कहीं भारत के महत्वपूर्ण फैसले अमेरिका और चीन के परस्पर विरोधी दबावों के बीच एक पेंडुलम-गति को तो प्राप्त नहीं हो रहे हैं? 

हुअवेइ के संस्थापक की बेटी और उसकी मुख्य कार्यकारी मेंग वान्झाऊ के खिलाफ अभी अमेरिका में धोखाघड़ी का मामला चल रहा है. आरोप है कि इस कंपनी के सम्बन्ध एक ऐसी फर्म से हैं, जिसने प्रतिबन्ध के बावजूद ईरान को उपकरण बेचने की कोशिश की. 

भारत में मार्च-अप्रैल, 2020 तक 5G स्पेक्ट्रम की नीलामी हो सकती है. नीलामी का न्यूनतम मूल्य 5.86 लाख करोड़ रुपये है. स्पेक्ट्रम नीलामी के द्वारा सरकार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल्स के संचार के अधिकार बेचती है. ये सिग्नल देश की सुरक्षा सहित हर गतिविधि में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. प्रश्न ये है कि क्या इस क्षेत्र में किसी ऐसी कंपनी को प्रवेश दिया जाना चाहिए जिसका घनिष्ठ सम्बन्ध चीन की सेना से हो? 

दूसरी बात कि अगर पहले उस कंपनी को किस आधार पर निमंत्रित नहीं किया गया था, तो फिर अब अचानक किस आधार पर नीति बदल कर उसे निमंत्रित किया जा रहा है? कहीं सिर्फ चीन की धमकी के कारण तो नहीं? इतना महत्वपूर्ण फैसला लेने या बदलने के पीछे क्या अध्ययन किसके द्वारा किया गया? क्या जनता को इसकी जानकारी दिया जाना ज़रूरी नहीं था? 

अब याद करें कि हम सवा सौ करोड़ के देश हैं, जिसकी बागडोर 56 इंची के हाथ में है. हम 1962 में चीन से धोखा और हार खा चुके हैं. वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना अधिकार जताता है. हमारे केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह वहां जाते हैं, तो वह आधिकारिक रूप से आपत्ति दर्ज करता है, मसूद अजहर को आतंकी घोषित होने से बचाता है. पाकिस्तान को भारत के खिलाफ खुला समर्थन देता है. पाक अधिकृत कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा भारत की आपत्ति के बावजूद चीन पकिस्तान से ले चुका है. डोक्लाम में वह 73 दिन हमारी सीमा में घुस कर खड़ा रहा. अक्साई-चिन हमारी दुखती रग है. श्रीलंका में अभी हुए चुनाव में चीन समर्थक सरकार आ ही चुकी है. भूटान में वह अन्दर घुस कर सड़क बना रहा है. नेपाल में उसने अठारह समझौते किये, जिनके तहत चीन से रक्सौल तक रेल और सड़क यातायात स्थापित हो जाएगा. नेपाल अब चीन की झोली में जा चुका और चीन हमारे रक्सौल और देवरिया तक पहुँच रहा है. नेपाल में चीन समर्थक सरकार है ही. 

इधर भारत-चीन व्यापार में पलड़ा चीन की तरफ कितना भारी है, और ऊपर से हमारे छोटे-बड़े उद्योगों का चीन ने क्या हाल कर रखा है, यह स्वदेशी जागरण मंच अपने नैतिक देहांत के पूर्व सन्निपात में जबतब बड़बड़ाता ही रहा है. लेकिन हम साबरमती आश्रम में जिनपिंग के साथ झूले पर पेंगें लेते रहे या हमारे आश्रम में चीन हमें ही झूला झुलाता रहा है. जिनपिंग दुबारा आये तो माननीय मोदी जी के साथ ममल्लपुरम घूमने गए, बातें क्या हुईं, क्या निकला, सो तो पता नही, लेकिन यहाँ से वे सीधे काठमांडू गए. वहाँ उन्होंने वे अठारह घोषणाएं कर डालीं, जिनका जिक्र ऊपर है. संक्षेप में, चीन की रणनीति से पाकिस्तान, श्रीलंका, भूटान, नेपाल सब ओर से आप घिर गए हैं और आपकी अर्थव्यवस्था चीन के सामने हाथ बांधे खड़ी है.  

एक जानकारी और…. 2009 में चीनी वेबसाईट में एक लेख छपा था जिसमें सुझाव दिया गया था कि भारत को बीस लघु राष्ट्रों में बाँटा जा सकता है, कि ऐसा करना चीन के लिए न सिर्फ फायदेमंद रहेगा बल्कि उसे विभिन्न क्षेत्रीय आन्दोलनों और महत्वाकांक्षाओं को अपना समर्थन और बढ़ावा देकर यह प्रक्रिया तेज़ करनी चाहिए. उस लेख के अनुसार असं, मणिपुर, झारखण्ड, तमिलनाडु, बंगाल, खालिस्तान, कश्मीर इत्यादि ऐसे इलाके हैं जिन्हें चीन भारत से अलग होने में मदद कर सकता है. 

लेकिन आप गलबहियां डाले हुए हैं. जनता हिन्दू मुस्लिम खेल रही है. 

और अब यहाँ याद कीजिये ताइवान और उसकी उस छोटी सी कद काठी वाली राष्ट्रपति त्साई वेन इंग को. और सोचिये कि हिन्दू-मुस्लिम मारण-उच्चाटन पाठ से देश को आप कबतक बरगलाते रहेंगे.

लेखक गुंजन सिंहा प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Leave a Reply

spot_img

Hot Topics

Related Articles

Don`t copy text!