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पत्रकार रवि प्रकाश के 6 दिसंबर 1992 की डायरी

By: रवि प्रकाश

हमारी क्लास चल रही थी। दिल्ली के पॉश इलाके साउथ एक्सटेंशन पार्ट-2 में हम इस इत्मिनान में थे कि क्लास नियत वक़्त पर ख़त्म होगी। और हम यहाँ महफ़ूज़ हैं। बी एम धवन सर आरगेनिक केमिस्ट्री के एक अध्याय में क़रीब क़रीब डूब चुके थे। तभी सेंगल सर क्लास में आए। उन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस की सूचना दी और हमारी क्लास तत्काल ख़त्म कर दी गयी। हमें जल्दी से अपने-अपने घर पहुँचने को कहा गया। हम ( मेरे साथ मेरा दोस्त और रुममेट दिवाकर भी था) बाहर निकले। बस स्टॉप पर अजीब-सी दहशत थी। हर आदमी जल्दी में था। दर्जनों क़िस्म की अफ़वाहें तैर रही थी। किसी ने बताया कि चाँदनी चौक इलाके में कर्फ़्यू लगा दिया गया है। कुछ दंगे जैसी ख़बरें थीं। कुछ वक़्त पहले तक महफ़ूज़ हम दोनों बुरी तरह डर गए। लंबे इंतज़ार के बाद 711 नंबर वाली हमारी बस आयी। ठसाठस भरी हुई। चढ़ना मुश्किल था। कोशिशें बेकार हुईं तो हमने अपनी जेबें टटोलीं। हमारे पास सिर्फ़ 20 रुपये थे। साफ़ था कि हमलोग  ऑटो नहीं ले सकते थे। बस में एक टिकट के सिर्फ़ 3 रुपये लगते। सो, तय हुआ कि अब जो भी बस आए, लटक जाना है। पुलिस की चहलक़दमी बढ़ गयी थी। इससे सुरक्षा बोध की बजाय डर लगने लगा था। लगा पेशाब कर लें। लेकिन, पास में कोई पब्लिक टायलेट नहीं था। ख़ैर 711 नंबर वाली हमारी बस फिर से आयी। वैसी ही ठसाठस। हमने इसी में चढ़ना मुनासिब समझा। चढ़ने पर अंदर जाने की जगह बन गयी। सबलोग बाबरी मस्जिद विध्वंस की ही चर्चा कर रहे थे। बस धौलाकुआं पहुँची तो अख़बार वाले की आवाज़ सुनायी पड़ी- एक रुपये में आडवाणी गिरफ्तार। अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद ढायी…। आदि-आदि। दरअसल, वह सांध्य टाइम्स बेच रहा था। उसकी क़ीमत तब एक रुपये हुआ करती थी। उस इवनिंगर में बाबरी मस्जिद विध्वंस की ख़बर छपी थी। मैंने वहीं पर एक अख़बार ख़रीदा। किसी तरह जनकपुरी पहुँचे। वहाँ से सागरपुर तक पैदल जाना था। सोचा था कि लौटते वक़्त थोड़ी सब्ज़ी लेंगे। क्योंकि घर में आलू भी नहीं था। सागरपुर नाले के पास सब्ज़ियों की दुकानें लगती थीं। लेकिन, सबकी सब बंद। बाज़ार भी बंद हो चुका था। घर पहुँचे तो मकान मालकिन आंटी ने काफ़ी देर तक घंटी बजाने के बाद दरवाज़ा खोला। दरअसल, वह यह सुनिश्चित कर लेना चाहती थीं कि घंटी बजाने वाले लोग कौन हैं। हम अपने कमरे में दाख़िल हुए। रेडियो खोला। उसपर वह सारी ख़बरें चल रही थीं। कहीं-कहीं दंगे शुरू हो चुके थे। उस रात हमने खिचड़ी बनायी। मोतिहारी से आते वक़्त माँ ने आम का अचार दिया था। उसके साथ खिचड़ी खायी। घर में सब्ज़ी नहीं थी और बाहर बाज़ार बंद था। लौटते वक़्त सोचा कि पीसीओ से घर पर फ़ोन करके बता दें कि हम सुरक्षित हैं। लेकिन, सारे पीसीओ बंद मिले। उस दिन मेरा पहली बार दहशत से साक्षात्कार हुआ। हम रात में नींद आने तक रेडियो पर समाचार सुनते रहे थे। इस उम्मीद में कि सुबह के अख़बार में विस्तृत ख़बरें मिलेंगी। सर, वह तारीख 6 दिसंबर थी, साल-1992 !

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