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प्रोपेगेंडा वार में भारत की करारी हार 

गुंजन सिन्हा  Written by: गुंजन सिन्हा  

फजीहत तो हो गई ज़बरदस्त. लेकिन बड़ा खतरा ये नहीं – बड़ा खतरा ये है, कि इस कठिन दौर में विदेश नीति, और भारत विरोधी दुष्प्रचार का मुकाबला करने की जिम्मेवारी आखिर किन हाथों में है?

हाउडी मोडी के बैंड बाजे बिदा होने के बाद कालीन के नीचे दबाए गए बकाया बिल बाहर आ रहे हैं. अमेरिकी सीनेट (विदेश मामले) की कमेटी ने कश्मीर मामले में भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया. पचास अमेरिकी सांसदों ने कश्मीर की स्थिति पर चिंता जताई. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अपनी सफाई में कहा कि प्रमुख नीति निर्णायकों को अमेरिकी मीडिया द्वारा गलत सूचना दिए जाने के कारण ऐसा हुआ है (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, की इंडिया इकोनॉमिक समिट, 4 अक्टूबर, दिल्ली). उन्होंने अपनी पीठ ठोकी कि 370 को लेकर फैली गलतफहमियां दूर करने के लिए कुछ हफ़्तों में उन्होंने कड़ी मेहनत की है.

लेकिन अगर उनकी कड़ी मेहनत का यह नतीजा है तो यह उनके लिए भी बहुत चिंता की बात होनी चाहिए. अमेरिकी मीडिया को वे गलत सूचना फैलाने का दोषी ठहरा रहे हैं, लेकिन भारत विरोधी प्रोपेगैंडा का सामना करने में अपने मंत्रालय की विफलता का जिक्र नहीं कर रहे हैं. दरअसल भारतीय विदेश नीति की यह तंत्रिकात्मक बीमारी नौकरशाहाना है, जिसका खामियाजा हम नेपाल में पहले से ही भुगत रहे हैं.

कूटनीति की दुनिया का अदना कारिन्दा भी जानता है कि गलत सूचना फैलाना ही प्रोपेगैंडा वार है. ज़मीनी लड़ाई से ज्यादा ज़रूरी यह युद्ध हमेशा चलता रहता है. महाभारत के ‘अश्वत्थामा हतो’ से लेकर चाणक्य, मैकियावेली और हिटलर तक, दुनिया इसकी अहमियत कई बार देख चुकी है.

फिलहाल सवाल है, अमेरिकी मीडिया गलत ख़बरें फैला रही थी, तो भारतीय दूतावास और उसके सूचना अधिकारी क्या कर रहे थे? विदेशों में छवि निर्माण के लिए अभूतपूर्व सक्रिय प्रधानमन्त्री के बावजूद पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा के खिलाफ भारत का प्रतिरोध प्रभावी क्यों नहीं हो पा रहा है? विदेशों की छोडिये, अपने कश्मीर में भी आम-जन के बीच आपकी इतनी साख क्यों नहीं है कि लोग दो माह बाद भी अपनी दूकानें खोलें?

उधर पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा की सक्रियता कश्मीर से मुंबई तक है. महाराष्ट्र के विशेष आरक्षी महानिरीक्षक (साइबर पुलिस) ने अभी अगस्त में कहा कि सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से पाकिस्तान फर्जी वीडियो और फ़ोटो फैलाने का अभियान चला रहा है. पाकिस्तान में प्रमाणित साइबर खातों के भारतीय नाम रख कर भावनाएं भड़काने वाली अफवाहें फैलाई जा रही हैं. उद्देश्य है, यह प्रचार करना कि कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिंसा और मानवाधिकारों का हनन हो रहा है. इसके लिए “हजारों वीडियो रोज़ बनानेवाली फैक्ट्री सीमा पर ही है.”

कश्मीर मसले पर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र आम सभा के महीने भर पहले ही भारत विरोधी प्रोपेगैंडा पूरी दुनिया में शुरू कर दिया था. अपने नागरिकों से उसने लगातार अपील की कि वे ट्विटर और सोशल मीडिया के हर माध्यम पर भारत के खिलाफ अभियान चलाएं. अपने विदेश मंत्रालय और दूतावासों में पाकिस्तान ने अलग कश्मीर डेस्क बना दिया है. उसका काम है, स्थानीय सरकारों और मीडिया के लोगों से मिल कर कश्मीर-अभियान चलाना और किसी भी तरह दुनिया को समझाना कि कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति बेहद खराब है.

पाकिस्तान की कश्मीर नीति में भी बड़ा बदलाव आया है. पहले पाकिस्तान अन्दर अन्दर जो भी करे, ऊपर से कश्मीरी अलगाववाद को सिर्फ नैतिक समर्थन देने की बात कहता था, लेकिन अब अब्दुल बासित (भारत में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत) जैसे कूटनीतिज्ञ भी भारत के खिलाफ जेहाद करने की बात कह रहे हैं. बासित ने यहाँ तक कह दिया कि पाकिस्तान तथा अन्य देशों को कश्मीर में सशस्त्र विद्रोह में मदद करने का हक है. पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री इमरान खान खुद इतने बौखला गए हैं कि वे स्वयं को कश्मीर का दूत कहने लगे हैं. जम्मू-कश्मीर सम्बन्धी भारत की अगस्त-कार्रवाई से पाकिस्तान की आंतरिक और विदेशी राजनीति में तूफ़ान आ गया है. पहले से ही इमरान खान के सामने तीन गंभीर समस्याएँ हैं – अपनी अस्थिर सत्ता, पाकिस्तान की आर्थिक दुर्गति और कट्टरपंथी. इन तीनों समस्याओं का निदान उन्हें कश्मीर प्रोपेगैंडा में दिख रहा है. कश्मीर में मानवाधिकार के हनन और मुसलमानों के दमन का मुद्दा उठा कर वे दुनिया खास कर अमेरिका, चीन और इस्लामी संगत के देशों के सामने एक बार फिर अपना कटोरा फैला सकते हैं. इसीलिए इस प्रोपेगैंडा को उन्होंने युद्धस्तर पर छेड़ रखा है. खैर ये उनका हक़ भी है. सवाल यहाँ नैतिकता का नहीं है. सवाल ये है कि पाकिस्तान के इस एकतरफा युद्ध के खिलाफ हमारा विदेश मंत्रालय तथा सूचना मंत्रालय क्या कर रहा है?

इस सम्बन्ध में भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट ही काफी कुछ कह देती है. उस रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत को शिकस्त दे रहा है. दुष्प्रचार को थामने की भारत की कोशिशों के बावज़ूद, पाकिस्तान कश्मीर मामले को दुनिया भर के मंचों तक ले जाने में सफल हो गया है.

चलिए मान लिया पाकिस्तान ने गलत किया. सवाल है, उसे सही करने के लिए आपने क्या किया? अगर भारत के विरोधी ऐसी सूचना फ़ैलाने में सफल हैं, तो यह उनकी काबिलियत और हमारी विफलता का ही तो परिचय है.

वह फजीहत थमी भी नहीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय या सूचना, या विदेश मंत्रालय, के कारिंदों ने एक और बड़ा गुल गपाड़ा कर दिया.

भारत में अंग्रेज-डाक्टरी शुरू होने के पहले देहातों में ज़र्राह हुआ करते थे. कोई घायल हो जाए, किसी को घाव-फोड़ा हो तो ये ज़र्राह ही चीर-फाड़ किया करते थे. यूँ ही उनकी याद आ गई.

कश्मीर पर भारत की बदहाल छवि देख विदेश/सूचना/प्रधानमन्त्री कार्यालयों के विशेषज्ञ/कारिंदे घबड़ा उठे. छवि की मरहम-पट्टी के लिए यूरोप से आनन-फानन ज़र्राह, सॉरी सांसद बुला लिए. घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध! आन गाँव के सिद्ध जब लाल कालीन पर चलते हुए, आन-बान के साथ श्रीनगर पहुंचे, तब घर के जोगड़ों ने बहुत बुरा माना. स्वाभाविक था. उन्हें तो मरीज़ को दूर से भी देखने नहीं दिया गया था. इलाज़ का मौका तो दूर की बात! हंगामा मचा. अनधिकृत (बिना लाइसेंसी) ज़र्राहों को सरकार ने श्रीनगर जाने दिया, जाने क्या दिया, खुद बुला कर ले गई. बात बढ़ी तो यूरोपीयन यूनियन ने पल्ला झाड़ लिया – हमने किसी को नहीं भेजा! तब सत्ताईस में से चार दिल्ली से ही लौट गए.

जो भी हो, कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में पकिस्तान सफल हुआ या नहीं, हम खुद ही हो गए. फ़ुटबाल की भाषा में सेल्फ-गोल! वैश्विक मंच पर भारत की जबरदस्त कूटनीतिक हार.

इसके पहले कश्मीर को भारत हमेशा द्विपक्षीय मसला मानता रहा है. अंतर्राष्ट्रीयकरण का पुरजोर विरोध हर प्रधानमन्त्री ने किया है. लेकिन यूरोप के सांसदों और अन्तराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों को कश्मीर जाने देकर सरकार ने इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया है. आश्चर्य है कि अभी कुछ ही दिन पहले भारत ने अमेरिकी दो सीनेटरों और विदेशी मीडिया को कश्मीर नहीं जाने दिया था. प्रधानमन्त्री ने उनसे मिलने से भी मना कर दिया था. फिर सरकार की नीति में अचानक ये यू-टर्न क्यों आया?

भारतीय नीति में इतने बड़े बदलाव किसी सोच और रणनीति के तहत लाए गए या बिना सोचे, ये आप किससे पूछियेगा?

बताते चलें कि तीन महीने की जिस आर्थिक नाकेबंदी ने नेपालियों के मन में भारत के प्रति नफ़रत भरी, नेपाल को चीन की ओर धकेल दिया, उस समय के विदेश सचिव ही अब विदेश मंत्री हैं.

(लेखक गुंजन सिन्हा टीवी व प्रिंट के वरिष्ठ पत्रकार हैं.  संप्रति स्वतंत्र चिंतन-लेखन में संलग्न हैं और दिल्ली के समीप गुरुग्राम में रहते हैं )

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