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देवघर के तांगे …..

\"शंकर  लेखक: शंकर स्नेहिल

देवघर के तांगे ……

देवभूमि देवघर नगरी के ऊंचे-नीचे ढलान भरे रास्तों पर पहला tri-cycle रिक्शा कब और कौन लेकर आया था, क्या पता ?

मगर, यहाँ का सबसे बड़ा तांगा स्टैंड – एक वक़्त, सदर अस्पताल के हरे रंग के मुख्य गेट से शुरू होकर Ray & Company के कोने तक होता था। पूरा टावर चौक इनके गले में बंधी घुंघरुओं की खनखन, भीगे चने और गुंडा की खुशबू से सराबोर हुआ करता था। 

छोटे-बड़े, काले-धौले-मटीले-चितकबरे, चेहरे पर सफ़ेद निशान, गर्दन और पूँछ पर लम्बे बाल, धूप में धमकते चमकीले चमड़ेवाले ये घोड़े चौक पर एक अलग ही शमा बांधे होते थे।

रिक्शा-एक्का दुक्का ही नज़र आता था। यह तब की बात है. जब मैं पालक माता फुआ का हाथ पकड़कर टावर चौक से होते हुए बाबा मन्दिर की ओर सुबह सुबह, नहा-धोकर, दर्शन के लिए जाता था। घोड़ों के प्रति तबसे मैं एक अज़ीब आकर्षण महसूस करता हूँ। तांगों को उस वक़्त मुख्य सवारी का दर्ज़ा हासिल था। कुछ टैक्सी भी थे पर उन्हें लोग ज़िला शहर दुमका, तारापीठ आदि दूर के स्थानों पर जाने के लिए किराए पर लेते थे।

त्रिकुट-तपोवन जाना हो या ट्रेन पकड़ने जसीडीह जंक्शन जाना हो तो स्थानीय लोग भी तांगे से ही जाते थे। तांगे चलानेवाले क़रीब-क़रीब सभी, चेकदार लुंगी और बनियान में, स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग ही हुआ करते थे। तांगे की सवारी का एक अलग ही मज़ा होता था। इसमें, पीछे तीन और आगे दो, पाँच लोग आराम से बैठ सकते थे। 

बचपन में, सभी भाई-बहन मिलकर एक तांगे में गुथमगूथ हो-हल्ला करते हुए, तपोवन, कुण्डा, नौलखा मन्दिर होते हुए बावन बीघा के मदमस्त गुलाबों का नज़ारा देखकर, शाम घर पर आकर दादी को रोमांचक सफ़र की कहानी सुनाने की याद – आज भी, आंखों को नम कर गई।

घोड़े की खुरों की टपटप, दुनिया के इतिहास की गलियारों में दूर तक सुनाई देती है। चाहे आर्य हों या मुग़ल, ब्रिटिश हो या जर्मन, 6000 सालों से अधिक समय से, रथ खींचते, फिटन और बग्गी खींचते, महीपति सम्राटों और सैनिकों को पीठ पर बंधे जीन पर बैठाए, ये घोड़े हमारे साथ हैं। 

केवल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही तक़रीबन दो करोड़ घोड़े मारे गए थे।

आज भी भारत के राष्ट्रपति के पास घुड़सवार दस्ता है। सोने की सजावटवाली अश्वचालित फिटन है।

देवघर नगरपालिका के मेयर भी किसी ज़माने फिटन पर चढ़कर शहर-परिदर्शन पर निकलते थे। उनकी सवारी को , सोनपुर मेले से ख़रीदा हुआ एक विशाल सफ़ेद रंग का, अरबी घोड़ा खींचता था। 

शहर के कुछ बड़े वक़ील भी हर रोज़ अपने निजी फिटन से कचहरी आते थे। उनमें , कास्टर टाउन के रहनेवाले वक़ील श्री कन्हाई वर्मन और बरमसिया के श्री गजानन्द प्रसाद जी , मेरे पिता के ख़ास मित्र भी थे।

चलिए , अब तांगे पर लौटते हैं  …..

जनप्रिय सवारी होने के साथ-साथ इनको लेकर कुछ रोचक प्रसंग भी प्रचलित  हैं।

एकबार …

 एक changer बाबू अपनी पत्नी के साथ, सुबह-सुबह , सात-साढ़े सात बजे, तूफ़ान एक्सप्रेस पकड़ने,टावर चौक से जसीडीह के लिए तांगा लिया। कुछ आगे बढ़ने पर तांगेवाले को याद आया कि वह अपने घर से घोड़े का चारा लाना भूल गया, तो पुरंदहा मोड़ पर आटा चक्की के पीछे घोड़े का चारा मिलता था, उसने वहाँ तांगा रोक दी. फ़िर अपने सवारी युवक से बोला। ' बाबू , आपनी बोसुन आमि गुंडा लिए आसछि …' कहकर गाड़ी से उतरा और गली के अन्दर भागा।

अनजान शहर , अनजान सवारी, कहकर गया कि वह गुंडा लाने जा रहा है ..आशंकित बाबू ने देर न लगाई। उसके वापस आने से पहले बीवी और समान सहित भाग निकले।

दूसरा घटनास्थल ….  नन्दन पहाड़ के पास सड़क पर :

हम दो मित्र शाम को टहल रहे थे. अचानक दूसरी तरफ़ से एक तांगे को ख़तरनाक स्पीड से आते देखा। घोड़ा गाड़ी कभी दायें से बायें, कभी बायें से दायें लहरा रही थी. घोड़ा लड़खड़ा रहा था. यात्री 'धीरे धीरे ' चिल्ला रहे थे. पर तांगेवाला लापरवाह घोड़े के पीठ पर चाबुक से प्रहार करता चला जा रहा था।कोई सन्देह नहीं था कि किसी भी क्षण बेक़ाबू होकर गाड़ी पलट जाएगी…. वह दिसंबर की शाम थी , जाड़े के महीनों में उन दिनों देवघर changer से पटा होता था। तांगेवाले कभी खाली नहीं होते थे.Trip पर trip -घोड़ों की तो शामत आ जाती थी । ऐसे में , थकान दूर करने के लिए तांगेवाले उन्हें महुए का दारू पिलाते थे। बरमसिया का महुआ प्रसिद्ध था।

ख़ैर , अवसम्भावी दुर्घटना की आशंका से शंकित हम दोनों ने किसी तरह घोड़ा-गाड़ी रुकवाई। तांगेवाला – नशे में चूर, हसन था। आंखें जवाकुसुम की भाँति लाल. वह किसी तरह लुंगी संभालते हुए तांगे से उतरा। उसने भी हमें पहचान लिया था। दोनों हाथ जोड़ कर 'नमस्ते ..' बोला।

हम गुस्से से गुर्राए – ' मारभीं की …हवाईजहाज उड़ावे छिं ?!'

वह माफ़ी की मुद्रा में आगे की ओर झुकता हुआ बड़बड़ाया .. ' उ बाबू घोडोवाक थोड़ा ज्यादा भैय गेल छे …' उसके कहने का तात्पर्य कि वह तो ठीक था. घोड़े को शराब थोड़ी ज्यादा लग गई थी।

अब और कुछ बातें।

जीवन के हर क्षेत्र में अर्थशास्त्र की भूमिका है। एक वक़्त आया जब tri-cycle रिक्शों ने , देवघर के तांगों के अस्तित्व को चुनौती दे दी। घोड़ों की देखरेख आसान नहीं है।  उन्हें रोज़ाना मालिश की ज़रूरत पड़ती है। चारे का , भीगे चने का , अस्तबल का इंतज़ाम करना होता है। एक-एक कर स्टैंड से तांगे कम होते चले गए। रिक्शों ने उनकी जगह ले ली। देवघर के मैदानों में अक्सर चरते दिखनेवाले घोड़ा और उसका छोटा शावक हमेशा के लिए विलुप्त हो गया। तांगे को मारक चोट शायद हिंदुस्तान मोटर्स और महिंद्रा में बने तेज़ और सस्ते किरायेवाले Trekker,tempo ने पहुंचाई थी।  और अब तो इलेक्ट्रिक रिक्शों का ज़माना आ गया।

दो बहुत ही रोचक तथ्य पेश करता हूँ:

घोड़ों पर आदि पुस्तक ' शोलिहोत्र' महाभारत काल से भी पहले ऋषि शोलिहोत्र द्वारा लिखी गई थी। हाल ही के एक survey में यह पाया गया कि चाहे कितनी भी बेशक़ीमती न्यूनतम वायुप्रतिरोधी डिज़ाइन की गाडियाँ सड़कों पर दौड़ती दिखें। London में ट्रैफिक की औसत गति 100 साल पहले के अश्वयुग में चलनेवाले वाहनों के बराबर ही है।

लेखक,शंकर स्नेहिल … पेशे से इंजीनयर हैं. 

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