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कच्चे बांस को नये आकार देकर उपयोगी सामान बनाने वाले मोहली समुदाय के हालात में नहीं हुआ बदलाव

Reported by: शिव कुमार यादव 

देवघर/सारठ।

बदलते भारत के साथ बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है. लेकिन आज भी कच्चे बांस से घर-गृहस्थी के उपयोग के लिए कई तरह के आवश्यक सामानों को तैयार करने वाले मोहली समुदाय के लोगों के जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं हो रहा है।

बांस को टुकड़ों में काटकर और उसे नये आकार देकर आम लोगों को सुविधा पहुंचाने वाले बांस के कारीगर के रूप में जाने वाले इन समुदाय की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। आधुनिक युग में भी इन्हें सरकारी उपेक्षा के कारण पुस्तैनी धंधे करने के लिए विवश मोहली समुदाय को दो जून की रोटी जुटाने में काफी संघर्ष का सामना करना पड़ता है।

सारठ प्रखंड क्षेत्र के ग्राम-पंचायत शिमला में लगभग 25 घर मोहली परिवार निवास करते है। परिवार के सभी सदस्यों रोजमर्रा बांस से बनाये जाने वाले सूप, डलिया, टोपा, खांचा, ढाकी, पंखा आदि सामान बनाते है। आये दिन बांस के कमानी के साथ इन परिवारों की अंगुलियां अठखेलियां करती है। जिससे किस्म-किस्म के सामान तैयार कर परिवार के सदस्य साप्ताहिक हाट-बाजारों में बैचने जाते है। लेकिन इन्हें अच्छा बाजार नहीं मिल पाता है। जिससे इनके जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है और सरकार भी इनके मेहनत को कम करने के लिए तनिक भी फिकरमंद नहीं हैं।

सरकारी सुविधा से वंचित:

मोहली समुदाय के लोगों का कहना है कि झारखंड बनने के बाद उन्हें उम्मीद जगी थी कि उनके उत्थान के लिए सरकार योजनाएं बनायेगी और उनके माली हालात सुधारने का प्रयास होगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

कहते है ग्रामीण:

ग्रामीणों ने बताया कि मेहनत के अनुसार सामग्री का मुल्य नहीं मिलता है। पुंजी के अभाव में हाट-बाजार में कम दाम में सामान बेचना पड़ता है। अगर सरकार से अनुदान पर कुछ सहयोग होता तो सामान इकट्ठा कर बड़े बाजार में ले जाने से अच्छी किमत भी मिल जाती। बताया कि इसी धंधे के भरोसे परिवार का गुजर बसर चलता है। थोडा बहुत जमीन है। मनरेगा से चार सिंचाई कूप भी मिला है। अगर पंप सेट रहता तो खेती भी करते। इस साल एक भी खेत नहीं रोपाया। पेट पालने में आफत है तो पंप सेट कहां से लेंगे। सरकार अनुदान में पंप सेट दे रही है। लेकिन हम गरीबों को नहीं मिलता। 

आर्थिक तंगी से आगे नहीं पढ़ पाये:

ग्रामीणों ने बताया कि उनलोगों ने मैट्रिक पास किया लेकिन आगे की पढ़ाई आर्थिक तंगी के चलते नहीं कर पाये। 

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