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इजराइल जाने के लिए गिरिडीह के किसान का चयन, ​उन्नत खेती कर किया मिसाल कायम

रिपोर्ट: आशुतोष श्रीवास्तव 

गिरिडीह : 

आम तौर पर लोग कहते हैं… पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब। लेकिन कम शिक्षा हासिल एक किसान के बेटे ने यह जता दिया कि खेल-खेल में खेती का गुर सीख कर सुर्खियां बटोरी जा सकती है। 

हौसले बुलंद हो और कुछ करने का जोश, जज्बा व जुनून हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है। कुछ ऐसा ही किया है जिले के गांडेय प्रखंड के मनियाडीह गाँव के किसान संतोष कुमार वर्मा ने। महज मैट्रिक पास संतोष एक छोटे से गाँव के रहने वाले सीधे-साधे इंसान हैं। उनकी उन्नत सोच ने उनका चयन इजराइल जाने के लिए करवाया है।

सरकार ने विशिष्ठ किसान के रूप में उनका चयन कर उनके नाम का अनुमोदन केंद्र सरकार के पास भेजा था। इस बावत संतोष कहते है कि वह बहुत पढ़े लिखे नहीं है। अधिक पढाई नही होने के कारण वह  नौकरी के बारे में सोच भी नही पाए थे। उनके पिता पुरानी परंपरा से खेती करते थे उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से खेती करनी प्रारम्भ की। आइडिया सफल रहा और अब वे अपने काम से संतुष्ट हैं।

धर संतोष की मेहनत और लगन से गांडेय प्रखंड के तमाम लोग खुश हैं। गांडेय के समाजसेवी अरुण कुमार पांडेय कहते हैं कि सन्तोष ने पहले प्रखंड का नाम रौशन किया और अब इजराइल जाकर प्रदेश का नाम रौशन करेगें। पाण्डेय का कहना है कि संतोष जैसे किसान को विदेश भेजकर राज्य की रघुवर और केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने साबित कर दिया है कि वे किसानों को उन्नत बनाने के लिए गंभीर हैं।

संतोष की चर्चा इस दिनों जिला मुख्यालय में भी हो रही है। गिरिडीह डीसी मनोज कुमार ने बताया कि सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए गम्भीर प्रयास कर रही है। कृषि विभाग के आत्मा के द्वारा किसानों को नई नई तकनीक की जानकारी दी जा रही है। गिरिडीह से किसान का विदेश जाना इसी की एक कड़ी हैं। विदेश से नई तकनीक सीखने के बाद वह अन्य किसानों को कम पानी मे अधिक उपज के गुर सिखायेंगे।

बहरहाल, संतोष के जज्बे ने यह साबित कर दिया है कि महज बुनियादी तालीम ही सब कुछ नहीं होती। कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो किसी भी क्षेत्र में अपनी ऊर्जा का सदुपयोग किया जा सकता है।  संतोष जैसे किसानों के शब्द में यही कहना काफी होगा कि.. ज़िंदगी कि असली उड़ान बाकी है, जिंदगी के कई इम्तेहान अभी बाकी है, अभी तो नापी है मुट्ठी भर ज़मीन हमने, अभी तो सारा आसमान बाकी है।

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