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पाठकों के इंतज़ार में सूना पड़ा है देवघर पुस्तक मेला


देवघरः

देवघर पुस्तक मेले से पाठक दूर होते जा रहे हैं. सात दिन पहले देवघर के आर मित्रा प्लस टू प्रांगण में पुस्तक मेले का आगाज हुआ था. लेकिन यहां लोगों की भीड़ नहीं पहुंच रही है. इसके चलते मेले में आने वाले प्रकाशकों को मुनाफा तो छोड़िये खर्च तक नहीं निकल पा रहा है.

पुस्तक मेला आयोजन समिति द्वारा बड़ी मुश्किलों से देवघर में 17वां पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है. लेकिन जिस तरह पुस्तक मेला का नज़ारा देखने को मिल रहा है, शायद हम इस मेले को खो देंगे. ऐसा हम नहीं बल्कि मेला में पहुंचे लोग और प्रकाशक की बातें कह रही है. 

मेला

17वां देवघर पुस्तक मेला का आयोजन आर मित्रा प्लस टू प्रांगण में किया गया है. 20 से 30 जनवरी तक आयोजित पुस्तक मेला में दर्जनों प्रकाशकों ने बुक स्टाॅल लगाये हैं. विभिन्न स्टाॅल्स में हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला‘, प्रेमचंद की ‘गोदान‘ व ‘प्रतिज्ञा‘, रामधारी सिंह दिन की ‘कुरूक्षेत्र‘ व ‘रश्मिरथी‘, डाॅ0 एपीजे अब्दुल कलाम की ‘अग्नि की उड़ान‘ और ‘मेरी जीवन यात्रा‘ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘गृहदाह‘, ‘बड़ी दीदी‘, ‘ब्राह्मण की बेटी‘, ‘देवदास‘ और ‘चरित्रहीन‘ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की ज्ञानवर्द्धक पुस्तकें, बच्चों के लिए पुस्तकें सहित कई लेखकों की पुस्तकें उपलब्ध हैं. लेकिन इन पुस्तकों को लेने वाला कोई नहीं है. 

मेला

देवघर पुस्तक मेला में कई प्रकाशक कई सालों से तो कईयों ने पहली बार स्टाॅल लगायें हैं. प्रकाशक कहते हैं कि इस तरह की हालत कभी नहीं थी कि दिनभर निकल जाये और एक किताब तक न बिके. जो प्रकाशक पहली बार आये हैं, उनका कहना है कि बहुत सुना था देवघर पुस्तक मेला के बारे में लेकिन दिख कुछ और ही रहा है. ऐसी ही हालत रही तो शायद ही दोबारा यहां बुक स्टाॅल लगाने को सोचेंगे. दूर-दराज़ से अलग-अलग पहुंचे प्रकाशकों ने बताया कि पुस्तक मेला में उसी समय भीड़ उमड़ती है, जब स्टेज पर कोई कार्यक्रम आयोजित होता है. लेकिन भीड़ पुस्तक खरीदना तो दूर स्टाॅल की ओर देखती भी नहीं है. वहीं मेला पहुंचे स्थानीय लोगों ने कहा कि यही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने शहर में हर साल लग रहे पुस्तक मेला को खो देगें. 

 

मेला

किसने क्या कहाः-

►प्रकाशन विभाग के इंचार्ज नरेंद्र कुमार ने बताया कि पिछले चार सालों से देवघर पुस्तक मेला में स्टाॅल लगा रहे लेकिन इस साल भीड़ देखने को नहीं मिली. उन्होंने कहा कि लोग आ ही नहीं रहे, तो पुस्तक देखेंगे कहां से और खरीदेंगे कहां से. या तो यहां पाठकों के बीच पुस्तकों में रूची नहीं रही है या उन्हें मेला के बारे में जानकारी ही नहीं है. 

नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली के प्रतिनिधि मो0 चांद ने कहा कि दिन-भर में एक-दो कस्टमर ही आते हैं. बाकि अगर कोई आया तो सिर्फ पुस्तक देख कर चले जाते हैं. 

किरण पब्लिकेशन के प्रतिनिधि जय नारायण झा ने बताया कि वह पिछले 10 सालों से देवघर पुस्तक मेला में स्टाॅल लगा रहे हैं. इस साल जैसा नज़ारा कभी देखने को नहीं मिला है. पुस्तक प्रेमियों की भीड़ न के बराबर दिख रही है. 

पहली बार स्टाॅल लगाये सत्यम पब्लिशिंग हाउस के आर. डी. पांडे ने कहा कि बहुत सुना था देवघर पुस्तक मेला के बारे में. लेकिन यहां कुछ और ही नज़र आ रहा है. मुनाफा तो छोड़िये. खर्च तक नहीं निकल रहा. ऐसे में अब उम्मीद कम ही है कि दोबारा यहां आने को सोचेंगे. 

सस्ता साहित्य मंडल पटना के ब्रांच प्रबंधक ने कहा कि पुस्तक मेला में प्रोग्राम की चर्चा ज्यादा होती है. पुस्तकों की कम. उन्होंने कहा कि आयोजकों द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. तब काफी भीड़ उमड़ती है. लेकिन वह मंच के पास तक ही सीमित रहती है. उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पुस्तकों के बारे में भी चर्चा करने की बात कही ताकि पुस्तक के प्रति लोगों में रूची पैदा हो और लोग पुस्तक खरीदें. 

सस्ता साहित्य मंडल के सदस्य संजीव कुमार सिंह ने भी कहा कि पहली बार यहां स्टाॅल लगाया लेकिन पुस्तक के प्रति लोगों की रूची न देख अब दोबारा आने की न सोचेंगे. उन्होंने कहा कि भीड़ सिर्फ मंच पर हो रहे कार्यक्रम के लिए ही उमड़ती है. हालत यह है कि विभिन्न स्टाॅल लगाये प्रतिनिधियों के खर्च तक नहीं निकल पा रहे. 

►  वहीं मेला में मौजूद देवघर मैत्रेय किड्स स्कूल की संचालिका ने मेला की सूनापन को देख कहा कि यह देवघर के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतना बड़ा मेला, इतनी सारी अलग-अलग किताबें और यहां के पुस्तक प्रेमियों में इसे खरीदने की ललक नहीं हो. उन्होंने देवघरवासियों से अपील की कि लोग बड़ी संख्या में पुस्तक मेला पहुंचे और पुस्तकों को खरीदें. नहीं तो शायद हम इस मेला को खो देंगे. क्योंकि देवघर के लोगों के इस रिस्पाॅन्स से जब प्रकाशक आयेंगे ही नहीं तो मेला का आयोजन कैसे होगा. 

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