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विकास के नाम पर ठगी का शिकार ये गांव…

रिपोर्टः गौतम मंडल


जामताड़ाः-

जामताड़ा जिले के कुंडहित प्रखंड का इकलौता नक्सल प्रभावित पंचायत आमलादही. जहां सरकारी योजनाओं का संचालन नियम कानून को ठेंगा दिखाकर किया जा रहा है. मजेदार बात यह है कि योजनाओ की गड़बड़ी को लेकर यहां लोग आवाज भी उठाते है लेकिन अधिकारी जनता की शिकायतों को नजरअंदाज कर देते हैं. ऐसे मे पंचायत के लोगों का सरकारी तंत्र से भरोसा उठता जा रहा है. जंगलों से घिरे और बंगाल बाॅर्डर की सीमा से सटे आमलादही पंचायत में अधिकारियों का दौरा भी न के बराबर ही होता है. हांलाकि स्थानीय लोग बताते है कि पूर्व मे बंगाल व अन्य राज्यों से नक्सली आते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों से वे नहीं आते है और न ही किसी प्रकार की नक्सली गतिविधि दिखती है. लोग कहते है कि पंचायत विकास के पायदान पर काफी पिछड़ा हुआ है. इस ओर न तो सरकार ध्यान दे रही है न ही जनप्रतिनिधि. ग्रामिणों का आरोप है कि पंचायत सचिवालय में सिर्फ दलालों का काम होता है, गरीबों का नहीं. 

पंचायत के विभिन्न गांवो के ग्रामीणों ने बेबाक होकर संचालित योजनाओं की पोल खोली. लोगों ने गांव की समस्याओ को भी बखूबी बताया.

जंगल और गोचर जमीन पर बना डोभा-
दलाबड़, फोड़ाकुसुम और आमलादही गांव मे सरकार की ओर से डोभा बनाया गया है. जो नियम से परे है. दलाबड़ निवासी विनय रवानी ने बताया कि गांव में अधिकांश डोभा जंगल एवं गोचर प्लाॅट पर बना दिया गया है. भू-संरक्षण विभाग का सबसे ज्यादा डोभा जंगल के प्लाॅट पर बना है. जिसे देखने वाला कोई नहीं है. ग्रामीणों ने कहा कि इन गांवो में योजनाओं की जांच करने के लिए कोई भी नहीं आता है. 

डोभा बना नहीं निकल गया पैसा-
दलाबड़ गाँव के ही जयदेव रवानी के नाम मनरेगा से डोभा पास हुआ. डोभा तो बना नहीं लेकिन हजारो रुपए की फर्जी निकासी हो गई. लाभुक को जब इस बात की जानकारी हुई तो वह हतप्रभ रह गया. इसकी जानकारी देते हुए जयदेव रवानी ने बताया कि रोजगार सेवक और मुखिया की मिलीभगत से बिचैलिया ने बिना डोभा खोदे अठारह हजार रुपये की निकासी की है. उपायुक्त को आवेदन देकर जांच की मांग की लेकिन अबतक जांच नहीं हुई.

फर्जी मास्टर रोल पर भी हुई है निकासी-
सोनाचुरा गांव मे भी पंचायतकर्मियों की मिलीभगत से फर्जी मास्टर रोल पर हजारो रुपए की राशि निकालने का मामला है. इस संबंध में ग्रामीण धनपति घोष ने कहा कि मेरे नाम से डोभा का रेकॉर्ड बनाकर बारह हजार रुपये की निकासी बिचैलिया ने कर ली है. जबकि डोभा का भी अता-पता नहीं है. इसकी शिकायत बीडीओ सहित अन्य अधिकारी को की गयी है, लेकिन किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गयी. आख़िरकार न्यायालय की शरण ली है.

नहीं मिला है आवास का लाभ-

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झापदाहा गांव में अलग राज्य बनने के बाद से अबतक किसी को भी सरकारी आवास का लाभ नहीं मिला है. ग्रामीण परिमल कर्मकार, अर्जुन कर्मकार, निर्मल कर्मकार ने बताया कि गाँव मे 35 घर हैं लेकिन किसी को भी आवास का लाभ नहीं मिल पाया है. सभी अपने-अपने मिट्टी के घर मे किसी तरह दिन गुजार रहे हैं. 

नहीं मिल रहा है खाद्य सुरक्षा का लाभ-
झापदाहा गाँव में कई लोग राशन से भी वंचित हैं. इन लोगों को न तो राशन कार्ड मिला है और न ही जन वितरण प्रणाली दुकान से किसी प्रकार का लाभ. ग्रामीण मिशिर कर्मकार ने बताया कि उनके परिवार में सात लोग हैं. इतने लोगों का भरण-पोषण काफी मुश्किल से हो रहा है. बावजूद खाद्य सुरक्षा का लाभ नहीं मिल रहा है. राशन कार्ड भी नहीं मिला है. एक साल से खाद्यान्न के लाभ से वंचित रह गए है. डीलर, मुखिया सभी को आवेदन दिया लेकिन कुछ नहीं हुआ. 

एक साथ बना दो डोभा- 

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झापदाहा गांव में दो डोभा एक साथ बना है. एक मनरेगा से तो दूजा भू-संरक्षण विभाग से. दोनों को नियम के विपरीत एक साथ सटाकर बना दिया गया है. एक और जगह इसी तरह का ही नजारा दिखता है. 

पेयजल संकट बरकरार-
चुटियापाड़ा में 38 घर है. इस गांव में छह चापाकल में एक ही चापाकल चालू अवस्था में है. बाकी महिनों से खराब है. श्रीमतडीह में भी दो चापाकल है जिसमें एक सालभर से खराब है. वहीं एक अन्य से दुर्गंध युक्त पानी निकलता है. 

खराब सड़के पंचायत की पहचान-

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कुंडहित-खाजुरी मुख्य पथ से जोरहबिंगा होते हुए दलाबड़ तक की आठ किलोमीटर की सड़क बड़े-बड़े पत्थरों से पटा है. जिसपर लोग आवाजाही करने से डरते है. लिहाजा ग्रामीण सड़क के नीचे कच्चे पथ पर चलते हैं. इसी तरह सोनाचुरा, आदिवासी टोला, झापदाहा, श्रीमतडीह गांव में भी कच्चा पथ है. सोनाचुर -काटना, मदारहीह-सोनाचुरा सहित कई गांवो को एक दुसरे से जोड़़ने वाली नदी घाटो में पुल नहीं है. ऐसे में बारिश के मौसम में इनका संपर्क कट जाता है.

पुलिया विहीन पथ बना दुर्घटना का सबब-

पथ
आमलादही पंचायत सचिवालय के पास और सोनाचुरा आदिवासी टोला स्कूल के पास मिट्टी मोरम पथ खतरनाक साबित हो सकता है. दोनों पथ पर पुलिया नहीं बनाया गया है. जिस वजह यह रास्ता आवागमन के लिए महफूज नहीं है. 

वर्षों से हो रहा है पलायन –
पंचायत में रोजगार का घोर अभाव है. काम के अभाव मे लोग बंगाल पलायन करते हैं. यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है. पलायन को रोकने और काम दिलाने में विधायक, सांसद व जिला प्रशासन विफल है. ग्रामीण हेमलाल किस्कू, भाते टुडू,दिनेश हांसदा ने बताया कि राज्य अलग हुआ, जिला अलग हुआ लेकिन हम आदिवासियों को आज भी पापी पेट के खातिर बंगाल जाकर कमाना पड़ता है.

क्या कहते हैं समाजसेवी-
समाजसेवी कन्हाईमाल पहाड़िया ने कहा कि यदि पंचायत के विकास योजनाओं की निष्पक्ष जांच की जाए तो व्यापक तौर पर अनियमितता पकड़ी जाएगी. लेकिन इस पंचायत मे लूट-खसोट के प्रति प्रशासन मौन है. उन्होंने कहा कि पंचायत में काफी समस्याएं हैं जिसे देखने वाला कोई नहीं है. 

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