Latest News

Opinion







भारत आज भले ही निजीकरण की इस अंधी दौड़ में शामिल है, लेकिन ...

जिस सैद्धांतिकी पर पब्लिक सेक्टर का वजूद टिका था, खुद उसके कर्मचारियों के बड़े हिस्से की आस्था ही उस पर नहीं रह गई थी। उदारीकृत होते अर्थतंत्र में मध्य वर्ग की आर्थिक समृद्धि बढ़ी तो पब्लिक सेक्टर के कर्मी भी उसके लाभान्वितों में थे। सेवा की सुरक्षा, आकर्षक वेतन, काम की अच्छी परिस्थितियों ने उनकी क्रय क्षमता में अभूतपूर्व विस्तार किया और वे बाजार के प्रभावशाली उपभोक्ता समाज की अग्रणी पंक्ति में शामिल हो गए। अब वे सार्वजनिक सेवाओं की जगह निजी क्षेत्र की सेवाओं के सक्षम क्रेता थे और जाने-अनजाने उसके मुखर प्रवक्ता भी।

Read More